भीलवाड़ा। राजस्थान में लगातार सामने आ रही प्रसूताओं की मौत के मामलों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले दो महीनों में प्रदेश के पांच जिलों में 18 प्रसूताओं की मौत हो चुकी है, जिनमें भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में एक सप्ताह के भीतर चार प्रसूताओं सहित पांच महिलाओं की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। इन घटनाओं के बाद हर बार जांच कमेटियां तो बन रही हैं, लेकिन मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा।
सबसे दर्दनाक कहानी ईशा पांडेय के परिवार की है। 5 जुलाई को अस्पताल में भर्ती हुई ईशा का 6 जुलाई को ऑपरेशन हुआ, लेकिन 8 जुलाई को उनकी मौत हो गई। पीछे रह गई उनकी चार साल की बेटी दिशा, जो हर दिन अपने पिता से सिर्फ एक सवाल पूछती है—"मम्मी कब आएगी?" वहीं सात दिन का नवजात अपनी मौसी की गोद में पल रहा है। पति और परिजनों का आरोप है कि समय पर इलाज नहीं मिलने और डॉक्टरों की लापरवाही के कारण ईशा की जान गई।
अस्पताल प्रशासन ने हालांकि सभी मौतों को अलग-अलग चिकित्सकीय जटिलताओं का परिणाम बताते हुए लापरवाही से इनकार किया है। वहीं चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय समीक्षा करते हुए जांच के निर्देश दिए हैं। इस बीच अस्पताल के एक ऑपरेशन थिएटर के संक्रमण की रिपोर्ट, आशा सहयोगिनियों की हड़ताल और लगातार बढ़ रहे मातृ मृत्यु के मामलों ने स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। अब पूरे प्रदेश की नजर जांच रिपोर्ट और सरकार की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई है।
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