राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी अन्नपूर्णा रसोई योजना, जिसका उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को मात्र 8 रुपए में भरपेट भोजन उपलब्ध कराना है, राजधानी जयपुर में चुनौतियों का सामना करती दिखाई दे रही है। शहर के कई अन्नपूर्णा रसोई केंद्रों पर ताले लटके हुए हैं, जिससे गरीब, मजदूर और जरूरतमंद लोगों को सस्ते भोजन की सुविधा नहीं मिल पा रही है।
स्थानीय स्तर पर किए गए निरीक्षण में सामने आया कि शहर के कम से कम आठ अन्नपूर्णा रसोई केंद्र लंबे समय से बंद पड़े हैं। खानिया, रामगढ़ मोड़ और रामगंज चौपड़ जैसे प्रमुख क्षेत्रों में स्थित रसोइयों पर ताले लगे मिले। कई स्थानों पर यह भी जानकारी नहीं थी कि रसोई कब से बंद है और दोबारा कब शुरू होगी।
खानिया क्षेत्र में सुबह करीब 11:15 बजे अन्नपूर्णा रसोई बंद मिली। आसपास के व्यापारियों के अनुसार यह केंद्र करीब दो माह से संचालित नहीं हो रहा है। भोजन की उम्मीद में आने वाले लोग ताला देखकर वापस लौट जाते हैं। इसी तरह रामगढ़ मोड़ स्थित केंद्र पर भी दोपहर 12 बजे ताले लगे मिले। स्थानीय लोगों ने बताया कि यह रसोई भी करीब दो माह से बंद है और रोजाना लोग भोजन की जानकारी लेने आते हैं।
रामगंज चौपड़ क्षेत्र में स्थित अन्नपूर्णा रसोई भी बंद पाई गई। वहां आसपास के लोगों ने बताया कि यह केंद्र करीब ढाई माह से बंद है। पहले यहां सुबह और शाम दोनों समय बड़ी संख्या में लोग भोजन करने आते थे और लंबी कतारें लगती थीं। अब जरूरतमंद लोगों को भोजन के लिए अन्य स्थानों की तलाश करनी पड़ रही है।
वहीं ईदगाह क्षेत्र में संचालित अन्नपूर्णा रसोई में दोपहर करीब 1:30 बजे ही भोजन समाप्त हो चुका था। वहां न रोटी उपलब्ध थी और न ही चावल। रसोई कर्मियों का कहना था कि दिन का पूरा भोजन वितरित हो चुका है। हालांकि मौके पर भोजन करने वालों की संख्या काफी कम दिखाई दी। इसके अलावा केंद्र के बाहर योजना से संबंधित कोई स्पष्ट बोर्ड या सूचना पट्ट भी नहीं मिला।
नगर निगम अधिकारियों के अनुसार शहर में कुल 63 अन्नपूर्णा रसोइयां संचालित हैं, जिन पर हर वर्ष लगभग 6 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। अधिकारियों का कहना है कि कुछ संस्थाओं द्वारा लाभार्थियों के कूपन में कथित अनियमितताएं पाए जाने के बाद उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। जिन संस्थाओं को हटाया गया है, उनकी जगह नई संस्थाओं को जिम्मेदारी सौंपने की प्रक्रिया जारी है।
हालांकि प्रशासनिक कार्रवाई का सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो रोजाना कम कीमत पर भोजन के लिए इन रसोइयों पर निर्भर रहते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक नई व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक जरूरतमंदों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में योजना की निरंतरता और प्रभावी संचालन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
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