रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में भगवान कृष्ण और द्रौपदी की कथा शामिल है। प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण की उंगली कट गई और उससे खून निकलने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया।
कहा जाता है कि द्रौपदी के इस स्नेह से कृष्ण भावुक हो गए और उन्होंने उनकी रक्षा का वचन दिया। महाभारत की कथा में द्रौपदी के चीरहरण के दौरान कृष्ण द्वारा उनकी लाज बचाने के प्रसंग को इसी रक्षा भाव से जोड़ा जाता है।
एक अन्य प्रसिद्ध कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान विष्णु राजा बलि के साथ पाताल लोक में रहने लगे थे। माता लक्ष्मी उन्हें वापस वैकुंठ लाना चाहती थीं।
कहा जाता है कि माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया। इसके बाद राजा बलि ने उन्हें उपहार मांगने के लिए कहा। माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ लौटने देने का आग्रह किया और राजा बलि ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली।
रक्षाबंधन से जुड़ी एक और लोकप्रचलित कथा यमराज और उनकी बहन यमुना की है। मान्यता के अनुसार, यमुना ने यमराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उनकी लंबी उम्र की कामना की। बहन के स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया। इस कथा को भी भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के भाव का प्रतीक माना जाता है।
राखी की परंपरा से जुड़े कई ऐतिहासिक प्रसंग भी लोककथाओं में सुनने को मिलते हैं। इनमें रानी कर्णावती और हुमायूं का प्रसंग सबसे ज्यादा चर्चित है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर सहायता की अपील की थी।
इसी तरह सिकंदर की पत्नी और राजा पुरु से जुड़ी कहानी भी राखी के रिश्ते के संदर्भ में सुनाई जाती है। हालांकि इन घटनाओं के ऐतिहासिक विवरण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, लेकिन लोकपरंपरा में इन्हें राखी के वचन और भाईचारे की मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।
रक्षाबंधन का रिश्ता सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रहा। 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को सामाजिक एकता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधने और आपसी एकता का संदेश देने की अपील की थी।
इस तरह राखी का धागा भाई-बहन के रिश्ते के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव और एकजुटता का प्रतीक भी बन गया।
श्रावण पूर्णिमा का दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में नारली पूर्णिमा मनाने की परंपरा है। दक्षिण भारत के कई हिस्सों में इसी अवसर पर अवनि अवित्तम के तहत जनेऊ बदलने की परंपरा निभाई जाती है।
वहीं पश्चिम बंगाल और ओडिशा में झूलन पूर्णिमा के दौरान राधा-कृष्ण को झूला झुलाने की परंपरा देखने को मिलती है। यानी एक ही दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में त्योहार की अलग-अलग रंगत नजर आती है।
रक्षाबंधन के दिन बहनें पूजा की थाली सजाकर भाई को तिलक लगाती हैं, आरती उतारती हैं और उसकी कलाई पर राखी बांधती हैं। भाई भी बहन को उपहार देकर हर परिस्थिति में उसका साथ देने का वादा करता है।
आज तकनीक ने त्योहार मनाने का तरीका जरूर बदल दिया है। दूर रहने वाले भाई-बहन वीडियो कॉल के जरिए एक-दूसरे से जुड़ते हैं और ऑनलाइन राखी व उपहार भेजते हैं। लेकिन दूरी और समय के बदलाव के बावजूद इस त्योहार की भावनाएं आज भी उतनी ही मजबूत हैं।
रक्षाबंधन का संदेश आखिरकार यही है कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं, बल्कि प्यार, विश्वास और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने से मजबूत होते हैं। यही वजह है कि सदियों पुरानी राखी की परंपरा आज भी भाई-बहन के रिश्ते में वही मिठास और अपनापन बनाए हुए है।
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