जैसलमेर/जोधपुर। राजस्थान में पहले स्कूलों में शिक्षकों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां डाली गईं और अब सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों को आवारा कुत्तों से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जोधपुर और जैसलमेर के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों को नोडल ऑफिसर नियुक्त कर दिया गया है, जिनकी ड्यूटी होगी कि अस्पताल परिसर में किसी भी हाल में आवारा कुत्तों की एंट्री न हो।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना में जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने यह कदम उठाया है। इसके तहत अस्पताल परिसरों में मरीजों की सुरक्षा और स्वच्छता बनाए रखने के लिए नगर निगम और नगर परिषद से समन्वय की जिम्मेदारी सीधे अस्पताल में तैनात डॉक्टरों को दी गई है।
फिलहाल यह व्यवस्था—
जोधपुर के प्रतापनगर सरकारी अस्पताल
मंडोर सैटेलाइट हॉस्पिटल, जोधपुर
जैसलमेर के जवाहिर हॉस्पिटल
में लागू की गई है।
इन अस्पतालों में जारी आदेशों में साफ लिखा गया है कि हॉस्पिटल परिसर में आवारा कुत्ते नहीं होने चाहिए और इसकी जिम्मेदारी नोडल अधिकारी की होगी।
प्रतापनगर हॉस्पिटल, जोधपुर – डॉ. नरेश चौहान
मंडोर सैटेलाइट हॉस्पिटल, जोधपुर – डॉ. निर्मला बिश्नोई
जवाहिर हॉस्पिटल, जैसलमेर – डॉ. सरदाराराम पंवार (डेंटिस्ट)
जैसलमेर के पीएमओ डॉ. रविंद्र सांखला ने बताया कि राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि अस्पताल में कुत्तों की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए। इसी कारण डॉक्टर को नोडल अधिकारी बनाया गया है।
नोडल अधिकारी को नगर निगम और नगर परिषद के साथ मिलकर कई स्तरों पर काम करना होगा—
बाउंड्रीवॉल ऊंची करवाना:
जहां अस्पताल की चारदीवारी नीची है, वहां उसे ऊंचा करवाया जाएगा ताकि कुत्ते कूदकर अंदर न आ सकें।
गेट प्रबंधन:
अस्पताल के मुख्य और अन्य गेटों को नियंत्रित रखा जाएगा, ताकि कुत्तों की एंट्री रोकी जा सके।
नगर निगम/परिषद से समन्वय:
परिसर में मौजूद कुत्तों को सुरक्षित तरीके से बाहर निकलवाने और पकड़वाने के लिए निगम की टीम से संपर्क किया जाएगा।
रिपोर्टिंग:
समय-समय पर पूरी व्यवस्था की रिपोर्ट तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेजनी होगी।
अधिकारियों का कहना है कि अस्पताल में कुत्तों की मौजूदगी से मरीजों, बुजुर्गों और बच्चों को खतरा रहता है। कई जगह काटने और डराने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। इसी को देखते हुए यह सख्त फैसला लिया गया है।
राजस्थान में अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए डॉक्टरों को नोडल ऑफिसर बनाना एक नया और चर्चित कदम है। भले ही इसे लेकर सवाल उठ रहे हों, लेकिन प्रशासन का मानना है कि इससे अस्पताल परिसरों में स्वच्छता और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। आने वाले दिनों में यह व्यवस्था प्रदेश के अन्य अस्पतालों में भी लागू हो सकती है।
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