जोधपुर: में जीएसटी विभाग ने एक बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा किया है, जिसमें रेलवे में काम दिलाने का झांसा देकर एक व्यक्ति के नाम पर फर्जी फर्म बनाकर करीब 90 करोड़ रुपए के फर्जी GST ई-बिल काटे गए। इस मामले में चार लोगों पर गंभीर आरोप हैं, लेकिन अब तक पुलिस की कार्रवाई सवालों के घेरे में है।
पीड़ित कानाराम के अनुसार, आरोपियों निलेश हर्ष, आनंद व्यास, फिरोज खान और प्रफुल्ल ने उसे बड़ी कंपनियों और रेलवे में ठेकेदारी का काम दिलाने का भरोसा दिया। इसी बहाने उसके नाम और दस्तावेजों का इस्तेमाल कर ‘जीके ट्रांसपोर्ट’ नाम से फर्म रजिस्टर्ड करवा दी गई। कानाराम कम पढ़ा-लिखा होने के कारण आरोपियों के झांसे में आ गया।
आरोपियों ने न केवल फर्म बनाई, बल्कि उसी की आड़ में उसके पैन कार्ड और जीएसटी नंबर का उपयोग करते हुए करीब 90 करोड़ रुपए के फर्जी जीएसटी ई-बिल काट दिए। इस फर्जीवाड़े की जानकारी तब सामने आई, जब कानाराम के मोबाइल पर जीएसटी विभाग का नोटिस आया।
कानाराम रेलवे में छोटे स्तर पर ठेकेदारी का काम करता था। आरोपियों ने उसे रेलवे में बड़ा काम दिलाने का दावा किया और कुछ काम दिलवाया भी, लेकिन आज तक उसका भुगतान नहीं हुआ। इस पूरे फर्जीवाड़े के चलते रेलवे में उसका करीब 50 लाख रुपए का बॉन्ड भी अटका हुआ है।
आरोपियों ने कानाराम को बताया कि उसका ऑफिस जसवंत सराय स्थित है, जबकि बाद में बिना उसकी जानकारी के ऑफिस का पता बदलकर कुड़ी भगतासनी के 14F-14 पर कर दिया गया। अलग-अलग विभागों में काम दिलाने के नाम पर उससे एप्लीकेशन फॉर्म पर साइन करवाए जाते रहे।
साल 2021 में आरोपियों ने रिलायंस कंपनी में वेंडर बनाने का झांसा देकर फिर से दस्तखत करवाए और करीब 1 लाख रुपए अलग-अलग मदों में ले लिए, लेकिन न तो वेंडर लाइसेंस मिला और न ही कोई काम।
मामले की गंभीरता को देखते हुए 18 जुलाई 2024 को राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस कुलदीप माथुर ने निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के आदेश दिए थे। सरकारी अधिवक्ता ने कोर्ट को भरोसा दिलाया था कि जांच जल्द पूरी की जाएगी।
इसके बाद 12 अगस्त को अधीनस्थ अदालत के एसीजेएम ने भी मामले को गंभीर मानते हुए विवेक विहार थाना पुलिस को जांच कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए। बावजूद इसके, पीड़ित का आरोप है कि आज तक आरोपियों को पूछताछ के लिए भी नहीं बुलाया गया।
एसीपी (बोरानाडा) आनंद सिंह राजपुरोहित ने बताया कि विवेक विहार थाने में 90 करोड़ के फर्जी GST ई-बिल का मामला दर्ज है। फाइल मंगवाकर उसकी समीक्षा की गई है और कुछ बिंदुओं पर जांच के निर्देश एसएचओ को दिए गए हैं। परिवादी को बुलाकर उसका पक्ष भी सुना गया है।
रेलवे में काम दिलाने का झांसा देकर किया गया यह 90 करोड़ रुपए का GST फर्जीवाड़ा न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि सिस्टम की लापरवाही को भी उजागर करता है। हाईकोर्ट और निचली अदालत के स्पष्ट आदेशों के बावजूद कार्रवाई में देरी कई सवाल खड़े कर रही है। अब देखना होगा कि जांच एजेंसियां कब तक इस बड़े फर्जीवाड़े के आरोपियों तक पहुंच पाती हैं।
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