नई दिल्ली। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है। बुधवार को दिन के कारोबार में रुपया 91.99 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। समाचार एजेंसी PTI के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली और वैश्विक स्तर पर बढ़ते व्यापारिक तनाव की वजह से रुपये पर भारी दबाव देखने को मिल रहा है।
साल 2026 की शुरुआत से ही भारतीय करेंसी कमजोर रुख दिखा रही है। दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 के स्तर के पार गया था। इसके बाद महज 20 दिनों के भीतर यह 91 का स्तर भी पार कर अब 92 के करीब पहुंच गया है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि ग्लोबल अनिश्चितता के कारण निवेशक जोखिम से बचने के लिए डॉलर और गोल्ड जैसी सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगातार भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। जनवरी 2026 के पहले 22 दिनों में ही एफपीआई ने करीब ₹36,500 करोड़ की बिकवाली कर दी है। जब निवेशक भारतीय बाजार से निकलते हैं, तो वे रुपये को डॉलर में बदलते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर हो जाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक टैरिफ नीतियां, यूरोपीय देशों के साथ बढ़ता तनाव और ‘ग्रीनलैंड विवाद’ ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। ऐसे हालात में निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका जैसे सुरक्षित बाजारों में निवेश कर रहे हैं, जिससे डॉलर और मजबूत हो रहा है।
अमेरिका में बेरोजगारी दर में गिरावट और मजबूत आर्थिक आंकड़ों ने यह संकेत दिया है कि वहां ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। ज्यादा रिटर्न की उम्मीद में वैश्विक निवेशक अमेरिकी बॉन्ड और बैंकों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे डॉलर की मजबूती बढ़ रही है और रुपये पर दबाव बन रहा है।
CR फॉरेक्स एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित पाबारी के अनुसार, 92.00 का स्तर रुपये के लिए मजबूत रेजिस्टेंस साबित हो सकता है। यदि वैश्विक तनाव में कमी आती है और डॉलर की मजबूती कमजोर पड़ती है, तो रुपया 90.50 से 90.70 के दायरे में वापस आ सकता है।
रुपये के कमजोर होने का सीधा असर आम लोगों पर पड़ेगा।
इंपोर्ट महंगा होगा, जिससे ईंधन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी चीजों के दाम बढ़ सकते हैं
विदेश यात्रा और विदेश में पढ़ाई करना और महंगा होगा
विदेशी कर्ज की लागत बढ़ेगी
उदाहरण के तौर पर, पहले जहां 1 डॉलर के लिए 50 रुपये खर्च करने पड़ते थे, अब छात्रों को करीब 91 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं, जिससे फीस, रहना और अन्य खर्च काफी बढ़ गए हैं।
किसी भी देश की मुद्रा की कीमत मुख्य रूप से डिमांड और सप्लाई, विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
जब डॉलर की मांग बढ़ती है, तो रुपया कमजोर होता है
फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व घटने पर भी रुपये पर दबाव आता है
निवेश का प्रवाह बढ़ने से करेंसी मजबूत होती है
भारतीय रुपया इस समय वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और डॉलर की मजबूती के तिहरे दबाव में है। हालांकि 92 का स्तर मनोवैज्ञानिक रूप से अहम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में वैश्विक संकेतों और निवेश के रुख से तय होगा कि रुपया और फिसलेगा या यहां से संभलने की कोशिश करेगा।
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