राजस्थान: के नागौर जिले में एक ऐसा भावुक दृश्य देखने को मिला, जिसने हर आंख नम कर दी। 24 साल पहले आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए भागीरथ कड़वासरा की बेटी की शादी में 13 ग्रेनेडियर्स के 24 जवान वर्दी में पहुंचे। उन्होंने पिता की भूमिका निभाते हुए सभी पारंपरिक रस्में पूरी करवाईं और नम आंखों से बेटी को विदा किया।
गांव के लोग एक स्वर में बोले—“अपने लोग परंपराएं भूल सकते हैं, लेकिन सेना नहीं।” यह सिर्फ एक शादी नहीं थी; यह उस वादे की पूर्ति थी, जो साथियों ने 2002 में शहादत के बाद अपने वीर साथी के परिवार से किया था।
मेड़ता उपखंड के पास ग्राम पंचायत कड़वासरो की ढाणी में 21 फरवरी को सुष्मिता की शादी डांगावास निवासी प्रशांत जाखड़ के साथ संपन्न हुई। सुष्मिता उस समय मात्र डेढ़ साल की थीं, जब 8 जून 2002 को असम के मिलनपुर गांव में आतंकियों के खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान उनके पिता भागीरथ कड़वासरा वीरगति को प्राप्त हुए।
उनकी वीरता और अद्वितीय साहस के लिए भारत सरकार ने 26 मार्च 2003 को उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया।
आज वही बेटी विवाह बंधन में बंधी तो सेना ने पिता का दायित्व निभाते हुए वादा पूरा किया।
शादी समारोह में 13 ग्रेनेडियर्स बटालियन के कमान अधिकारी कर्नल सोमेन्द्र कुमार, रिटायर्ड कर्नल सुरेश चंद्र राणा सहित 24 जवान शामिल हुए। रिटायर्ड कर्नल राणा ने बताया कि जब भागीरथ कड़वासरा शहीद हुए थे, तब वे कमांडिंग ऑफिसर थे।
उन्होंने कहा, “यह कोई आधिकारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ग्रेनेडियर्स की परंपरा है। हम अपने जवानों को परिवार मानते हैं और परिवार का फर्ज निभाना हमारा कर्तव्य है।”
गुड़गांव से विशेष रूप से पहुंचे रिटायर्ड कर्नल राणा ने विवाह की रस्मों से पहले शहीद की प्रतिमा पर पुष्पचक्र अर्पित कर सलामी दी।
विवाह समारोह के दौरान दुल्हन सुष्मिता को सैनिक ही स्टेज तक लेकर आए। कन्यादान से लेकर आशीर्वाद तक की हर रस्म में जवानों ने पिता की भूमिका निभाई।
जब विदाई का समय आया तो जवानों की आंखें नम हो गईं। यह दृश्य देखकर गांव के लोग भी भावुक हो उठे। ग्रामीणों का कहना था कि आज के समय में जब लोग पारिवारिक जिम्मेदारियों से कतराते हैं, ऐसे में सेना द्वारा निभाई गई यह जिम्मेदारी प्रेरणादायक है।
रिटायर्ड कर्नल राणा के अनुसार, 8 जून 2002 को असम के मिलनपुर गांव में आतंकियों के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन के दौरान भागीरथ कड़वासरा ने अद्वितीय साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए दुश्मनों का मुकाबला किया और वीरगति को प्राप्त हुए।
उनकी बहादुरी ने पूरी बटालियन को गर्वित किया। यही कारण है कि साथियों ने उसी समय संकल्प लिया था कि वे उनके परिवार का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे।
भागीरथ कड़वासरा का जन्म 10 जनवरी 1978 को नागौर जिले के कड़वासरो की ढाणी में हुआ था। उनके पिता का नाम हप्पाराम और माता का नाम मंगली देवी है।
5 जनवरी 1995 को वे भारतीय सेना की 13 ग्रेनेडियर्स बटालियन में भर्ती हुए। कम उम्र में ही उन्होंने अपने साहस और अनुशासन से वरिष्ठ अधिकारियों का विश्वास जीता।
उनका विवाह टालनपुर निवासी संतोष के साथ हुआ था। शहादत के बाद परिवार ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन सेना का सहयोग हमेशा साथ रहा।
शादी में पहुंचे जवानों ने कहा, “हम अपने साथियों के परिवार को अपना परिवार मानते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। जब भी जरूरत होती है, हम अपने परिवार के साथ खड़े रहते हैं।”
उनका यह संदेश सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे देश के लिए था—कि भारतीय सेना अपने सैनिकों के परिवारों का सम्मान और जिम्मेदारी दोनों निभाती है।
जब वर्दी में 24 जवान गांव पहुंचे तो हर घर से लोग उन्हें देखने उमड़ पड़े। बच्चों ने सलामी दी, बुजुर्गों ने आशीर्वाद दिया। पूरे गांव में गर्व और भावनाओं का संगम दिखाई दिया।
ग्रामीणों ने कहा कि यह आयोजन सिर्फ एक शादी नहीं, बल्कि सेना की उस भावना का प्रतीक है, जिसमें साथी के परिवार को अपना परिवार माना जाता है।
यह घटना युवाओं के लिए प्रेरणा का संदेश है। सेना सिर्फ सीमाओं की रक्षा नहीं करती, बल्कि अपने मूल्यों और परंपराओं से समाज को भी दिशा देती है।
भागीरथ कड़वासरा की शहादत और 13 ग्रेनेडियर्स की यह पहल बताती है कि देशभक्ति सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि जीवन भर निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है।
नागौर शहीद भागीरथ कड़वासरा बेटी की शादी केवल एक समाचार नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपरा और कर्तव्य का जीवंत उदाहरण है। 24 साल बाद निभाया गया यह वादा भारतीय सेना की उस संस्कृति को दर्शाता है, जहां साथी का परिवार अपना परिवार होता है।
वर्दी में पहुंचे जवानों ने यह साबित कर दिया कि शहादत के बाद भी सैनिकों का साथ कभी नहीं छूटता। यह घटना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।
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