अजमेर: के बहुचर्चित फोटो ब्लैकमेलिंग कांड में मुआवजा वितरण को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में राज्य सरकार ने बताया कि विशेष कोर्ट के आदेश के बावजूद 17 में से अब तक केवल दो पीड़िताओं को ही मुआवजा दिया गया है। सरकार का दावा है कि शेष 14 पीड़िताओं या उनके परिजनों ने सात-सात लाख रुपये की मुआवजा राशि लेने में रुचि नहीं दिखाई है।
यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि कोर्ट ने 20 अगस्त 2024 को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए प्रत्येक पीड़िता को 7 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था और 30 दिन के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने को कहा था। लेकिन फैसले के करीब डेढ़ साल बाद भी अधिकांश पीड़िताओं को राशि नहीं मिल पाई है।
भाजपा विधायक संदीप शर्मा द्वारा पूछे गए प्रश्न के जवाब में विधि विभाग ने स्पष्ट किया कि अजमेर की पॉक्सो मामलों की स्पेशल कोर्ट संख्या-2 ने अपने निर्णय में 17 पीड़िताओं के लिए कुल 1 करोड़ 19 लाख रुपये (7-7 लाख प्रति पीड़िता) देने का आदेश जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को दिया था।
सरकार के अनुसार, अब तक केवल दो पीड़िताओं को कुल 14 लाख रुपये की राशि का भुगतान किया गया है। एक पीड़िता का निधन हो चुका है, जबकि 14 पीड़िताओं को भुगतान लंबित है।
विधानसभा में दिए गए लिखित जवाब में कहा गया है कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने शेष पीड़िताओं और उनके परिजनों से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने मुआवजा लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई।
सरकार ने यह भी कहा कि कोर्ट के आदेशों की पालना में अगले तीन वर्षों तक भुगतान के प्रयास जारी रहेंगे। यदि कोई पीड़िता तीन वर्ष के बाद भी मुआवजा लेने की इच्छुक होती है, तो उसे राशि प्रदान की जाएगी।
हालांकि इस दावे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिन पीड़िताओं ने वर्षों तक सामाजिक कलंक और मानसिक आघात झेला है, वे अपनी पहचान उजागर होने के डर से सामने नहीं आना चाहती होंगी। ऐसे में केवल “रुचि नहीं दिखाने” को आधार बनाकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना उचित नहीं माना जा सकता।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कई पीड़िताएं वर्षों से अपनी पहचान छिपाकर रह रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन को संवेदनशील और गोपनीय प्रक्रिया अपनानी चाहिए, ताकि पीड़िताएं बिना किसी भय के मुआवजा प्राप्त कर सकें।
कानूनी जानकारों के अनुसार, मुआवजा केवल आर्थिक सहायता नहीं होता, बल्कि यह न्याय प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे पीड़िताओं को पुनर्वास और मानसिक सहारा मिलता है।
अजमेर फोटो ब्लैकमेलिंग कांड देशभर में 1992 में सामने आया था। आरोप था कि एक गिरोह ने कॉलेज और स्कूल की छात्राओं को आपत्तिजनक फोटो के जरिए ब्लैकमेल कर उनका शोषण किया। मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर सनसनी फैला दी थी।
बताया गया कि करीब 100 छात्राएं इस गिरोह का शिकार बनीं। उस समय छह छात्राओं ने आत्महत्या कर ली थी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 23 जून 2001 को छह आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश की गई थी।
करीब 32 साल बाद, 20 अगस्त 2024 को कोर्ट ने छह दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसी फैसले में 17 पीड़िताओं को 7-7 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया गया था।
अब जबकि सजा सुनाए जाने के बाद भी अधिकांश पीड़िताओं को मुआवजा नहीं मिला है, तो यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या प्रशासन ने पर्याप्त प्रयास किए?
सामाजिक संगठनों का कहना है कि सरकार को पीड़िताओं के पुनर्वास के लिए सक्रिय पहल करनी चाहिए। केवल औपचारिक संपर्क कर लेने से दायित्व पूरा नहीं हो जाता।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि पीड़िताएं सामने नहीं आ पा रहीं, तो गोपनीय बैंकिंग चैनल, कानूनी प्रतिनिधि या विशेष प्रोटेक्शन मैकेनिज्म के जरिए भुगतान की व्यवस्था की जा सकती है।
विधानसभा में इस मुद्दे के उठने के बाद राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो सकती है। विपक्ष सरकार पर संवेदनशील मामलों में लापरवाही का आरोप लगा सकता है, जबकि सरकार का कहना है कि वह कोर्ट के आदेशों की पालना के लिए प्रतिबद्ध है और तीन वर्षों तक प्रयास जारी रखे जाएंगे।
अजमेर फोटो ब्लैकमेल कांड जैसे ऐतिहासिक और दर्दनाक मामले में मुआवजा वितरण की धीमी प्रक्रिया न्याय की पूर्णता पर सवाल खड़े करती है। अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद 17 में से केवल दो पीड़िताओं को ही राशि मिलना चिंताजनक है।
सरकार का कहना है कि शेष पीड़िताओं ने रुचि नहीं दिखाई, लेकिन यह भी जरूरी है कि प्रशासन उनकी परिस्थितियों, सामाजिक दबाव और सुरक्षा चिंताओं को समझते हुए अधिक संवेदनशील और सक्रिय भूमिका निभाए।
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