जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए समाज को कड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने अपनी 12 साल की मासूम बेटी के साथ दरिंदगी करने वाले एक पिता की अपील को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने 8 जनवरी 2026 को दिए अपने आदेश में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 'मृत्यु तक आजीवन कारावास' की सजा को बरकरार रखा है।
यह रूह कंपा देने वाली घटना 12 अगस्त 2022 की है। डूंगरपुर जिले की रहने वाली पीड़िता की मां रक्षाबंधन के त्योहार पर अपने भाइयों को राखी बांधने पीहर गई थी। घर पर पिता अपनी तीन बेटियों और तीन बेटों के साथ अकेला था। इसी सूनेपन का फायदा उठाकर उसने अपनी ही 7वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी के साथ बलात्कार किया। जब मां घर लौटी, तो बच्ची ने रोते हुए पिता की काली करतूत बयां की। पीड़िता ने बताया कि इससे पहले भी जब मां अस्पताल में भर्ती थी, तब पिता ने दो बार उसके साथ गलत काम किया और मुंह खोलने पर जान से मारने की धमकी दी।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने बेहद भावुक और सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा:
"जब पिता, जिसे बच्चे की ढाल और नैतिक मार्गदर्शक माना जाता है, वही उसकी शारीरिक अखंडता का उल्लंघन करे, तो यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं बल्कि एक संस्थागत और प्राकृतिक विश्वासघात है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि बाप-बेटी के पवित्र रिश्ते को कलंकित करने वाले ऐसे मामलों में नरमी दिखाना न्याय प्रशासन को कमजोर करने जैसा होगा।
आरोपी के वकील ने तर्क दिया था कि डीएनए (DNA) रिपोर्ट नेगेटिव आई है और पत्नी तलाक लेना चाहती थी, इसलिए उसने झूठा मुकदमा दर्ज कराया। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि:
पीड़िता की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय, स्वाभाविक और तार्किक है।
मेडिकल रिपोर्ट पुष्टि करती है कि बच्ची के साथ संबंध बनाए गए थे।
बच्ची की उम्र 12 साल से कम है, इसलिए सहमति का कोई स्थान नहीं है।
केवल डीएनए रिपोर्ट नेगेटिव आने या रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी होने से आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता।
अपने फैसले में न्यायमूर्तियों ने प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक का उल्लेख किया— "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता"। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति में महिलाओं और बच्चों की गरिमा सर्वोपरि है और इसके साथ किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने 'विक्टिम कंपनसेशन स्कीम-2018' के तहत राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि पीड़िता को 7 लाख रुपए का मुआवजा तुरंत प्रदान किया जाए, ताकि उसके पुनर्वास में सहायता मिल सके।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला उन अपराधियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो पारिवारिक रिश्तों की आड़ में घिनौने कृत्यों को अंजाम देते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वैज्ञानिक रिपोर्ट (DNA) की तकनीकी खामियों से ऊपर 'पीड़िता का सत्य' और 'नैतिक मर्यादा' है। यह निर्णय न्यायपालिका के उस संकल्प को दोहराता है जहाँ रक्षक के भक्षक बनने पर कानून का सबसे कठोर प्रहार सुनिश्चित है।
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