लखनऊ: के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में एक बार फिर महिला सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बाल रोग विभाग की एमडी की एक रेजिडेंट डॉक्टर ने विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. संजीव कुमार वर्मा पर यौन शोषण और छेड़खानी का आरोप लगाया है। शिकायत मिलने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी प्रोफेसर को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। पिछले 50 दिनों में संस्थान में सामने आया यह तीसरा मामला है, जिससे कैंपस का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है।
पीड़ित रेजिडेंट डॉक्टर ने 11 फरवरी को अपने परिजनों के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन से औपचारिक शिकायत की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि विभागाध्यक्ष स्तर के एक वरिष्ठ शिक्षक लंबे समय से अभद्र व्यवहार कर रहे थे और मोबाइल फोन पर आपत्तिजनक संदेश भेजते थे। छात्रा का कहना है कि वह लगातार मानसिक दबाव में थी, लेकिन जब घटनाएं बढ़ीं तो उसने परिवार को जानकारी दी और प्रशासन के सामने मामला रखा।
कुलपति के निर्देश पर उसी दिन विशाखा कमेटी को सक्रिय किया गया। कमेटी ने पीड़िता के बयान दर्ज किए और आरोपी प्रोफेसर से भी पूछताछ की। शुरुआती जांच में आरोप प्रथमदृष्टया सही पाए गए। रिपोर्ट के आधार पर 12 फरवरी को आरोपी एडिशनल प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया और उन्हें जांच पूरी होने तक डीन मेडिसिन कार्यालय से अटैच कर दिया गया। साथ ही, विभाग में उनके प्रवेश पर रोक लगा दी गई है।
विश्वविद्यालय के प्रवक्ता के अनुसार, घटना वाले दिन आरोपी प्रोफेसर ने रेजिडेंट डॉक्टर को किसी काम के बहाने अपने चैम्बर में बुलाया। वहां कथित रूप से उन्होंने पहले उसका हाथ पकड़ा और फिर अनुचित तरीके से छूने की कोशिश की। इस अप्रत्याशित व्यवहार से घबराई डॉक्टर तुरंत चैम्बर से बाहर निकलीं और विभाग की एक महिला फैकल्टी सदस्य को घटना की जानकारी दी।
पीड़िता का आरोप है कि यह पहली घटना नहीं थी। वह पहले भी मोबाइल पर संदेश भेजकर अनावश्यक बातचीत करने की कोशिश करते थे। जब उसने दूरी बनाने का प्रयास किया, तब उसे शैक्षणिक कार्यों के नाम पर बार-बार बुलाया जाने लगा।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि महिला सुरक्षा को लेकर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई गई है। शिकायत मिलते ही विशाखा कमेटी गठित कर दी गई और 24 घंटे के भीतर प्राथमिक कार्रवाई की गई। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जांच निष्पक्ष तरीके से की जाएगी और यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो कठोर अनुशासनात्मक कदम उठाए जाएंगे।
साथ ही, पीड़िता को किसी भी प्रकार के शैक्षणिक या मानसिक दबाव से बचाने के लिए आवश्यक सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित की जा रही है। प्रशासन ने यह भी कहा है कि संस्थान में महिला सुरक्षा से जुड़े प्रोटोकॉल को और मजबूत किया जाएगा।
इस घटना ने इसलिए भी अधिक गंभीरता हासिल की है क्योंकि बीते डेढ़ महीने में यह तीसरा मामला है।
पहला मामला (23 दिसंबर 2025):
एमडी पैथोलॉजी की एक छात्रा ने अपने सीनियर डॉ. रमीज पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने, गर्भपात कराने और धर्म परिवर्तन का दबाव डालने का आरोप लगाया था। पुलिस ने शिकायत के 18 दिन बाद आरोपी को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी से पहले उस पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया था। पुलिस ने उसके परिजनों पर भी कार्रवाई की थी और कई राज्यों में तलाश अभियान चलाया गया था।
दूसरा मामला (29 दिसंबर 2025):
एक नर्सिंग छात्रा ने इंटर्न डॉक्टर मोहम्मद अदील पर यौन शोषण और शादी का झूठा वादा करने का आरोप लगाया था। मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपी फरार हो गया था, जिसे 15 जनवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया। छात्रा का आरोप था कि आरोपी ने दोस्ती कर विश्वास में लिया और बाद में शारीरिक संबंध बनाकर शादी से मुकर गया।
इन दोनों मामलों में पुलिस कार्रवाई और संस्थागत जांच चल रही है। लगातार सामने आ रहे मामलों ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली और आंतरिक शिकायत तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ताजा घटना के बाद रेजिडेंट डॉक्टरों और छात्राओं के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है। कई छात्राओं ने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि वे वरिष्ठों के साथ अकेले मीटिंग से बचने की कोशिश करती हैं। कुछ ने यह भी मांग उठाई कि सभी विभागों में सीसीटीवी निगरानी बढ़ाई जाए और चैम्बरों में पारदर्शी व्यवस्था हो।
रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन के कुछ सदस्यों ने कहा कि संस्थान को महिला हेल्पलाइन, काउंसलिंग सुविधा और नियमित संवेदनशीलता कार्यशालाओं का आयोजन करना चाहिए। उनका कहना है कि केवल कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि एक सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण बनाना जरूरी है।
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए गठित विशाखा कमेटी का दायित्व है कि वह शिकायतों की निष्पक्ष जांच करे और पीड़िता की गोपनीयता बनाए रखे। इस मामले में कमेटी ने त्वरित कार्रवाई की है, लेकिन अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया स्पष्ट होगी।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो आरोपी पर न केवल विभागीय कार्रवाई, बल्कि आपराधिक मुकदमा भी दर्ज हो सकता है। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत दोष सिद्ध होने पर कठोर दंड का प्रावधान है।
लगातार सामने आ रहे मामलों ने यह संकेत दिया है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सख्ती से लागू करना और शिकायतकर्ताओं को सुरक्षित माहौल देना भी उतना ही जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल संस्थानों में पदानुक्रम (हायरार्की) काफी सख्त होता है, जिससे जूनियर डॉक्टर अक्सर दबाव में रहते हैं। ऐसे में शिकायत दर्ज कराना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि विश्वविद्यालय प्रशासन आंतरिक शिकायत तंत्र की स्वतंत्र ऑडिट कराए और हर विभाग में जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं।
KGMU में सामने आया ताजा मामला न केवल एक व्यक्तिगत उत्पीड़न की घटना है, बल्कि यह संस्थागत सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा भी है। 50 दिनों में तीन गंभीर आरोपों का सामने आना यह दर्शाता है कि मेडिकल शिक्षा संस्थानों में महिला सुरक्षा को लेकर व्यापक सुधार की आवश्यकता है।
हालांकि प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी एडिशनल प्रोफेसर को निलंबित कर दिया है, लेकिन अंतिम न्याय तभी माना जाएगा जब जांच पूरी पारदर्शिता के साथ हो और दोषियों को सख्त सजा मिले।
इस बीच, सबसे महत्वपूर्ण है कि पीड़िताओं को सुरक्षित वातावरण, कानूनी सहायता और मानसिक सहयोग उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे बिना डर के अपनी पढ़ाई और पेशेवर जिम्मेदारियां निभा सकें।
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