लेखक: कर्नल देव आनंद लोहामरोड़
(सुरक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ)
पश्चिम एशिया: 28 फरवरी को पश्चिम एशिया की स्थिति निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई, जब दोपहर लगभग 12:00 बजे United States (संयुक्त राज्य अमेरिका) और Israel (इज़राइल) ने ईरान पर संयुक्त सैन्य कार्रवाई करते हुए युद्ध की औपचारिक शुरुआत की। इज़राइल ने इस अभियान का नाम “ऑपरेशन लॉयन्स रोअर” रखा, जबकि अमेरिका ने इसे “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नाम दिया। प्रारंभिक हमलों में ईरान के वायु-रक्षा तंत्र, मिसाइल समर्थन अवसंरचना तथा नियंत्रण एवं कमान केंद्रों को निशाना बनाया गया।
इसके प्रत्यक्ष प्रतिशोध में Iran (ईरान) ने अपना जवाबी सैन्य अभियान “ऑपरेशन फतेह हैदर” नाम से आरंभ करते हुए संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरीन, सऊदी अरब, कुवैत, इराक, जॉर्डन और इज़राइल में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों एवं सामरिक ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। इसी दौरान दुबई में सुरक्षा चेतावनी जारी की गई और Burj Khalifa (बुर्ज खलीफा) को एहतियातन खाली कराया गया, हालांकि उस पर प्रत्यक्ष मिसाइल प्रहार की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। समानांतर रूप से युद्ध और प्रतिबंधों के दबाव में ईरान की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ा है, और खुले बाज़ार में ईरानी रियाल की विनिमय दर गिरकर लगभग 13 से 15 लाख रियाल प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की सूचनाएँ सामने आई हैं। इससे स्पष्ट हो गया कि युद्ध अब प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में परिवर्तित हो चुका है।
मध्य-पूर्व को इस युद्ध में घसीटने का अर्थ है कि यह संघर्ष अब केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय अस्थिरता के माध्यम से वैश्विक दबाव उत्पन्न करेगा। ईरान द्वारा खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना सीधे अमेरिका के लिए यह संदेश है कि वह पीछे हटने वाला नहीं है और युद्ध की लागत बढ़ाई जाएगी। यदि इज़राइल और अमेरिका ईरान के भीतर कोई निर्णायक एवं विनाशकारी कार्रवाई करते हैं, तो संघर्ष प्रॉक्सी मोर्चों पर फैल सकता है और दीर्घकालिक युद्ध का रूप ले सकता है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो ईरान के लिए ऊर्जा मार्ग—विशेषकर Strait of Hormuz (हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य)—दबाव का प्रमुख साधन बन सकते हैं, जिससे तेल की कीमतों में उछाल, महँगाई तथा वैश्विक आर्थिक अस्थिरता की आशंका बढ़ जाएगी। स्पष्ट है कि यह युद्ध अब केवल सैन्य विजय का नहीं, बल्कि समय और सहनशक्ति का संघर्ष बनता जा रहा है।
ईरान की वास्तविक सैन्य क्षमता को लेकर अभी भी अनेक अनिश्चितताएँ हैं। माना जाता है कि उसके पास भूमिगत बैलिस्टिक मिसाइलों का विशाल भंडार है, जो पर्वतीय सुरंगों और सुदृढ़ ठिकानों में सुरक्षित रखा गया है। इन मिसाइलों की वास्तविक संख्या, उनकी परिचालन क्षमता और मारक दूरी को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। यही अनिश्चितता उसकी प्रतिरोध-नीति (डिटरेंस) की आधारशिला है।
ईरान की मिसाइल रणनीति इस सिद्धांत पर आधारित रही है कि वह इतनी मारक क्षमता प्रदर्शित करे कि किसी भी व्यापक हमले की कीमत अस्वीकार्य हो। इस संदर्भ में China (चीन) की संभावित तकनीकी सहायता को लेकर चर्चा होती रही है, यद्यपि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
दूसरी ओर, इज़राइल और अमेरिका की सामरिक श्रेष्ठता स्पष्ट दिखाई देती है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक उपस्थिति, विशेष रूप से USS Abraham Lincoln जैसे विमानवाहक पोत समूह की तैनाती, यह दर्शाती है कि ईरान पर चारों ओर से सैन्य निगरानी और दबाव बना हुआ है।
यह घेराबंदी केवल सैन्य नहीं, आर्थिक भी है। प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था दबाव में है; तेल निर्यात सीमित है, विदेशी मुद्रा भंडार कमज़ोर है और घरेलू आर्थिक चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। ऐसे में दीर्घकालिक उच्च-तीव्रता वाले युद्ध को बनाए रखना अत्यंत कठिन होगा।
यद्यपि ईरान ने जवाबी मिसाइल हमले किए हैं और अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है, किंतु प्रश्न यह है कि वह इसे कितने समय तक जारी रख सकता है। सीमित हमले रणनीतिक संदेश दे सकते हैं, परंतु युद्ध की दिशा नहीं बदलते। इज़राइल की बहु-स्तरीय वायु-रक्षा प्रणाली और अमेरिका की उपग्रह-आधारित खुफिया क्षमता के सामने ईरानी प्रक्षेपण स्थलों की सुरक्षा दीर्घकाल तक सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण है।
अंततः, ईरान के पास क्षति पहुँचाने की क्षमता अवश्य है, किंतु निर्णायक विजय की नहीं। उसके भूमिगत मिसाइल भंडार उसकी शक्ति का प्रतीक हैं, परंतु कमजोर अर्थव्यवस्था और सैन्य घेराबंदी उसकी सीमाएँ निर्धारित करती हैं। वर्तमान परिस्थिति में यह संघर्ष केवल ईरान बनाम इज़राइल-अमेरिका नहीं, बल्कि वास्तव में समय बनाम ईरान बनता जा रहा है।
वर्तमान हालात में यह संघर्ष केवल ईरान बनाम अमेरिका-इज़राइल नहीं, बल्कि “समय बनाम ईरान” बनता दिख रहा है। मिसाइल भंडार और सामरिक अनिश्चितता उसकी ताकत हैं, लेकिन आर्थिक कमजोरी और सैन्य घेराबंदी उसकी सीमाएं तय करती हैं। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह टकराव सीमित रहता है या वैश्विक संकट का रूप ले लेता है।
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