विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है और सवाल दाग रहा है—
“ठाकुर विधायकों की बैठक पर चुप्पी और ब्राह्मणों की बैठक पर चेतावनी क्यों?”
बीजेपी के भीतर ही इस सवाल पर मंथन शुरू हो गया है कि क्या प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने इस मामले में हड़बड़ी दिखा दी। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक,
“अगर संवाद के जरिए बात सुलझाई जाती, तो मामला वहीं खत्म हो जाता। चिट्ठी ने इसे सार्वजनिक और राजनीतिक बना दिया।”
पार्टी के अनुशासन के नाम पर जारी चेतावनी अब उस मुद्दे को और हवा दे रही है, जो विधानसभा सत्र खत्म होते-होते शांत हो सकता था।
दरअसल, अगस्त महीने में क्षत्रिय (राजपूत/ठाकुर) विधायकों की भी बैठक हुई थी, जिसे ‘कुटुंब परिवार’ नाम दिया गया था। उस बैठक में शामिल विधायकों ने खुले तौर पर इसकी पुष्टि की थी।
उस समय:
बीजेपी ने कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया
सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व ने बंद कमरे में संवाद के जरिए मामला संभाल लिया
यही बात अब विपक्ष को बीजेपी पर हमला करने का मौका दे रही है।
उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति में:
ब्राह्मण: लगभग 10–12% आबादी
ठाकुर (राजपूत): करीब 6–7% आबादी
संख्या भले सीमित हो, लेकिन दोनों ही जातियां राजनीतिक रूप से प्रभावशाली मानी जाती हैं। इनका रुख अगर बदला, तो चुनावी समीकरण भी बदल सकते हैं।
आगामी विधानसभा चुनाव में अब सवा साल से भी कम समय बचा है। ब्राह्मण और ठाकुर दोनों को परंपरागत रूप से बीजेपी का समर्थक माना जाता रहा है, लेकिन राजनीतिक हिस्सेदारी और सम्मान के सवाल पर इनका झुकाव बदलता भी रहा है।
बीजेपी को डर है कि:
अगर ब्राह्मणों की नाराजगी गहराई
और विपक्ष ने इसे मुद्दा बना लिया
तो चुनावी नुकसान तय हो सकता है
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साधु हैं और परंपरागत रूप से जाति से ऊपर माने जाते हैं, लेकिन राजनीति में उन्हें उनके पूर्वाश्रम और राजपूत पहचान से जोड़ा जाता है।
इसी आधार पर विपक्ष सवाल पूछ रहा है:
“क्या ठाकुरों की बैठक को नजरअंदाज और ब्राह्मणों की बैठक को नोटिस देना संयोग है?”
ब्राह्मण विधायकों की बैठक में शामिल विधायक सार्वजनिक तौर पर चुप हैं। इस बीच बैठक के आयोजक और कुशीनगर से विधायक पीएन पाठक ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया।
उन्होंने लिखा:
“सनातन परंपरा में ब्राह्मण समाज का मार्गदर्शक, विचारक और संतुलनकर्ता होता है। जहां ब्राह्मण एकत्र होता है, वहां ज्ञान और विवेक का मंथन होता है, विभाजन नहीं।”
इस पोस्ट को भी सियासी संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम के जरिए:
10% से ज्यादा आबादी वाले ब्राह्मण समाज को यह संदेश देना चाहता है
कि बीजेपी उन्हें सिर्फ वोट बैंक समझती है
विधायकों में भी:
नोटिस को लेकर नाराज़गी
और चुनावी साल में कार्रवाई का डर
दोनों भावनाएं साथ-साथ चल रही हैं।
यूपी की राजनीति का एक बड़ा तथ्य यह भी है कि:
1989 में नारायण दत्त तिवारी के बाद
पिछले 37 सालों में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना
हालांकि सत्ता में भागीदारी मिलती रही है, लेकिन सीएम पद तक न पहुंच पाने का दर्द ब्राह्मण समाज के भीतर अब भी मौजूद है।
ब्राह्मण समाज जानता है कि:
सपा और बसपा में सीएम बनने की संभावना नहीं
कांग्रेस से उम्मीद जरूर है, लेकिन उसका संगठन कमजोर
इसलिए फिलहाल बीजेपी ही एकमात्र व्यवहारिक विकल्प नजर आती है।
2007 में मायावती के दलित–ब्राह्मण फॉर्मूले ने यह साबित कर दिया था कि ब्राह्मणों का झुकाव सत्ता की तस्वीर बदल सकता है।
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की चेतावनी चिट्ठी ने बीजेपी के लिए एक अनावश्यक सियासी संकट खड़ा कर दिया है। सवाल यह नहीं कि बैठक हुई या नहीं, सवाल यह है कि संदेश क्या गया।
क्या यह मामला ब्राह्मण बनाम ठाकुर की राजनीति का रूप ले पाएगा, या बीजेपी समय रहते डैमेज कंट्रोल कर लेगी—
इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा। फिलहाल इतना तय है कि यह मुद्दा चुनावी साल में बीजेपी के लिए आसान नहीं रहने वाला।
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