नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा लागू किए गए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’ पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि नए नियमों के कई प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गई, जिनमें आरोप लगाया गया कि UGC के नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और नियमों का नया ड्राफ्ट तैयार करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
UGC ने ये नियम 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई किए थे और 15 जनवरी से इन्हें देशभर के UGC से मान्यता प्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लागू कर दिया गया था। नियम लागू होते ही दिल्ली समेत कई राज्यों में छात्रों द्वारा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने नियम 3(C) को चुनौती देते हुए कहा कि जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा एकतरफा और संकीर्ण है। उन्होंने तर्क दिया कि नियमों में यह मान लिया गया है कि भेदभाव का शिकार केवल कुछ वर्ग ही हो सकते हैं, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक व्यापक है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि यदि किसी दूसरे राज्य या क्षेत्र से आए छात्र के साथ अपमानजनक व्यवहार होता है, तो क्या ये नियम उसकी शिकायत का समाधान कर पाएंगे। कोर्ट ने यह भी कहा कि रैगिंग जैसे गंभीर मुद्दों की परिभाषा नियमों में स्पष्ट रूप से नहीं दी गई है, जिससे भविष्य में गलत इस्तेमाल की स्थिति बन सकती है।
UGC द्वारा नए नियम लाने के पीछे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातीय भेदभाव से जुड़े कई मामलों का हवाला दिया गया। वर्ष 2016 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला और 2019 में महाराष्ट्र की डॉक्टर पायल तडवी की आत्महत्या के मामलों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर UGC को जातीय भेदभाव से जुड़े मामलों का डेटा इकट्ठा करने और नियमों को सख्त बनाने के लिए कहा गया। संसदीय समिति की सिफारिशों के बाद UGC ने ड्राफ्ट में संशोधन कर जनवरी 2026 में नए नियम लागू किए।
नए नियमों में जातीय भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा दी गई है, जिसमें SC, ST के साथ OBC वर्ग को भी शामिल किया गया। इसके अलावा ड्राफ्ट में मौजूद झूठी शिकायतों पर सजा का प्रावधान अंतिम नियमों से हटा दिया गया।
कॉलेजों में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वाड बनाने का प्रावधान किया गया है। शिकायत मिलने पर 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक कार्रवाई और 15 दिनों में रिपोर्ट देने की व्यवस्था तय की गई है। नियमों के उल्लंघन पर कॉलेजों की मान्यता रद्द करने और ग्रांट रोकने तक की सजा का प्रावधान रखा गया है।
इन नियमों का विरोध करने वालों का कहना है कि भेदभाव की परिभाषा जनरल कैटेगरी के छात्रों को पीड़ित मानने से इनकार करती है। उनका आरोप है कि झूठी शिकायतों पर कोई सजा नहीं होने से फर्जी मामलों की संभावना बढ़ेगी।
इसके अलावा इक्विटी कमेटी में जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व का अभाव और कॉलेजों पर अत्यधिक दंडात्मक दबाव को भी विरोध का बड़ा कारण बताया जा रहा है। विरोध करने वाले यह भी दावा कर रहे हैं कि ये नियम UGC एक्ट 1956 के दायरे से बाहर हैं।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने UGC नियम 2026 का समर्थन करते हुए इसे उच्च शिक्षा प्रणाली में सुधार की दिशा में जरूरी कदम बताया है। वहीं भाजपा नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने इन नियमों को समाज को बांटने वाला करार दिया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप हैं और किसी वर्ग के साथ भेदभाव नहीं करते।
UGC के नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और भेदभाव मुक्त वातावरण बनाना है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की रोक से यह साफ हो गया है कि नियमों की भाषा और ढांचे में गंभीर खामियां हैं। अब 19 मार्च की सुनवाई पर यह तय होगा कि केंद्र सरकार और UGC इन नियमों को सभी वर्गों के लिए संतुलित और न्यायसंगत रूप में दोबारा तैयार कर पाते हैं या नहीं।
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