जयपुर: के जोन-13 अंतर्गत ग्राम कूकस में कृषि भूमि पर संचालित कथित अवैध होटल एवं मैरिज गार्डन “द अंदाज रिट्रीट” को लेकर एक बार फिर प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। स्थानीय नागरिकों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कृषि भूमि का व्यावसायिक उपयोग खुलेआम किया जा रहा है, जबकि नियमों के अनुसार ऐसा करना प्रतिबंधित है।
इस मामले में पहले भी संबंधित विभागों को शिकायत दी जा चुकी है, लेकिन अब तक किसी ठोस कार्रवाई का अभाव लोगों में असंतोष को बढ़ा रहा है।
कूकस क्षेत्र जयपुर-आगरा हाईवे के निकट तेजी से विकसित हो रहा इलाका है। यहां पर्यटन, होटल और मैरिज गार्डन की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी बीच “द अंदाज रिट्रीट” नामक रिसोर्ट के संचालन को लेकर सवाल उठे हैं कि यह कथित रूप से कृषि भूमि पर संचालित हो रहा है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि भूमि का मूल भू-उपयोग (लैंड यूज़) कृषि श्रेणी में दर्ज है, जबकि वहां होटल और समारोह स्थल के रूप में गतिविधियां चल रही हैं। यदि यह सही है, तो यह स्पष्ट रूप से भूमि उपयोग नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।
इस पूरे मामले में जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, संबंधित अधिकारी ममता मीणा से जब कार्रवाई के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा कि उच्चाधिकारियों के निर्देश के कारण फिलहाल कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
यदि यह बयान सही है, तो इससे यह संकेत मिलता है कि मामला प्रशासनिक स्तर पर लंबित या दबा हुआ है। हालांकि इस संबंध में जेडीए की ओर से कोई आधिकारिक सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
मामले के उच्च स्तर तक पहुंचने के बाद यह जानकारी भी सामने आई कि रिसोर्ट के नियमन की फाइल लंबित है। यानि कि संभवतः निर्माण को नियमित करने (रेगुलराइज करने) की प्रक्रिया जारी है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है—
जब तक नियमन की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक क्या निर्माण और संचालन को वैध माना जा सकता है?
भूमि उपयोग परिवर्तन (CLU) और अन्य स्वीकृतियां मिलने से पहले व्यावसायिक गतिविधियां शुरू करना नियमों के विरुद्ध हो सकता है। ऐसे में यदि फाइल लंबित है, तो संचालन पर रोक क्यों नहीं लगाई गई?
कूकस के कई स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि कोई छोटा किसान अपने खेत पर बिना अनुमति कोई छोटा निर्माण कर ले, तो तुरंत नोटिस और कार्रवाई हो जाती है। लेकिन बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मामले में प्रशासन की कार्रवाई धीमी या शिथिल दिखाई देती है।
स्थानीय निवासी मांग कर रहे हैं—
पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए
कृषि भूमि के दुरुपयोग पर सख्त कार्रवाई हो
संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच हो
उनका कहना है कि नियम सभी के लिए समान होने चाहिए।
राजस्थान में भूमि उपयोग परिवर्तन के स्पष्ट प्रावधान हैं। कृषि भूमि को व्यावसायिक उपयोग में बदलने के लिए निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है—जिसमें आवेदन, शुल्क, स्वीकृति और नक्शा पास होना शामिल है।
यदि बिना स्वीकृति व्यावसायिक गतिविधियां शुरू की जाती हैं, तो प्राधिकरण को नोटिस जारी कर निर्माण को सील करने या ध्वस्त करने का अधिकार होता है। हालांकि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और अंतिम निर्णय जांच के बाद ही लिया जाता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि शिकायतें पहले ही दर्ज हो चुकी हैं, तो अब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं हुई? क्या जांच जारी है? क्या फाइल पर कोई आपत्ति दर्ज की गई है?
प्रशासन की ओर से स्पष्ट और पारदर्शी जानकारी नहीं मिलने से अटकलें और चर्चाएं बढ़ रही हैं।
यह मामला केवल एक रिसोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक सवाल खड़ा करता है—क्या नियम प्रभावशाली लोगों के लिए अलग और आम नागरिकों के लिए अलग हैं?
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि कृषि भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियां बिना पूर्ण अनुमति चल रही हैं, तो यह शहरी नियोजन व्यवस्था की विफलता दर्शाता है।
कृषि भूमि का अंधाधुंध व्यावसायिक उपयोग दीर्घकालीन रूप से पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। कूकस जैसे क्षेत्रों में पहले ही तेजी से शहरीकरण हो रहा है। यदि नियमन के बिना निर्माण बढ़ता है, तो जल स्तर, यातायात और आधारभूत संरचना पर दबाव बढ़ सकता है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि जेडीए और जिला प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाते हैं। क्या जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होगी? क्या नियमन प्रक्रिया पूरी होने तक संचालन रोका जाएगा? या फिर मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
जनप्रतिनिधियों ने भी मांग की है कि मामले की पारदर्शी जांच हो और यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाए तो निष्पक्ष कार्रवाई की जाए।
कूकस में कृषि भूमि पर संचालित कथित अवैध रिसोर्ट का मामला केवल एक निर्माण विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और कानून के समान अनुपालन का प्रश्न बन गया है।
यदि नियमन लंबित है, तो स्पष्ट स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि निर्माण अवैध है, तो कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो प्रशासन को पारदर्शी रूप से तथ्यों को सामने रखना चाहिए।
इस प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नियम सभी के लिए समान रूप से लागू होते हैं या फिर प्रभाव और पहुंच के आधार पर अलग व्यवहार किया जाता है।
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