राजस्थान: के सीकर जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर में आयोजित बाबा श्याम का वार्षिक फाल्गुनी लक्खी मेला इस वर्ष भी आस्था, परंपरा और भक्ति के अनोखे संगम के साथ विधिवत संपन्न हो गया। 152 किलोमीटर दूर से पैदल चलकर पहुंचा सूरजगढ़ का पावन निशान जब मंदिर के शिखर पर चढ़ाया गया और द्वादशी पर बाबा को खीर-चूरमे का भोग अर्पित किया गया, तभी आठ दिन तक चले इस भव्य मेले का आधिकारिक समापन हुआ।
हालांकि इस बार श्रद्धालुओं की संख्या में गिरावट दर्ज की गई। मंदिर कमेटी के अनुसार 21 फरवरी से 28 फरवरी तक चले मेले में करीब 15 लाख श्रद्धालुओं ने बाबा श्याम के दर्शन किए, जबकि पिछले वर्ष 12 दिन चले मेले में लगभग 20 लाख भक्त पहुंचे थे। यानी इस बार करीब 5 लाख कम श्रद्धालु खाटू धाम पहुंचे।
हर वर्ष की तरह इस बार भी सूरजगढ़ से निकला पावन निशान 152 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी कर खाटू पहुंचा। यह केवल एक ध्वजा नहीं, बल्कि शौर्य, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक है। सूरजगढ़ से खाटू तक की यह यात्रा हजारों श्रद्धालुओं के साथ भक्ति-भाव में डूबी हुई रही।
जब यह निशान मंदिर परिसर में पहुंचा, तो ‘श्याम तेरी बंसी पुकारे’ और ‘हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा’ के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठा। मंदिर शिखर पर ध्वजा चढ़ाने की परंपरागत रस्म के साथ मेले के समापन की घोषणा की गई।
द्वादशी के अवसर पर बाबा श्याम को खीर और चूरमे का विशेष भोग लगाया गया। इसके बाद भव्य भोग आरती हुई, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। आरती के दौरान मंदिर परिसर में भक्ति का अद्भुत दृश्य देखने को मिला—घंटियों की ध्वनि, शंखनाद और पुष्पवर्षा ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
श्रीश्याम मंदिर कमेटी के मंत्री मानवेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि 3 मार्च को चंद्रग्रहण के कारण मंदिर के पट पूरे दिन बंद रहेंगे। 4 मार्च सुबह 5:30 बजे मंगला आरती के साथ पट पुनः खुलेंगे। उसी दिन रात 9 बजे विशेष सेवा पूजा और तिलक श्रृंगार के कारण पट फिर बंद कर दिए जाएंगे और 5 मार्च शाम 5 बजे दोबारा खोले जाएंगे।
इस बार मेले की अवधि 8 दिन रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में 4 दिन कम थी। इसके अलावा कई अन्य कारणों का भी प्रभाव भीड़ पर पड़ा—
सीबीएसई और राजस्थान बोर्ड की परीक्षाएं
खाटू-जयपुर बसों की हड़ताल
45 किलोमीटर पैदल चलने की अफवाह
चंद्रग्रहण के कारण होली पर कम रुकना
इन सब कारणों से श्रद्धालुओं की संख्या में कमी देखी गई। बावजूद इसके, मेले के समापन के बाद भी 14 लाइनों में लगकर भक्त बाबा के दर्शन कर रहे हैं।
मंदिर कमेटी के पूर्व अध्यक्ष प्रताप सिंह चौहान ने बताया कि इस बार VIP दर्शन पूरी तरह बंद रखे गए और VIP लाइन भी सामान्य भक्तों के लिए खोल दी गई। इससे आम श्रद्धालुओं को राहत मिली। हालांकि टीनशेड व्यवस्था और पार्किंग की दूरी के कारण कुछ असुविधाएं भी सामने आईं।
छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ दें तो पूरा मेला शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। पिछले वर्ष की तुलना में अधिक पुलिस बल तैनात किया गया था। मेडिकल, पानी, शौचालय और यातायात प्रबंधन की भी बेहतर व्यवस्था की गई।
खाटू श्याम जी के लाखों भक्त देश-विदेश में फैले हैं, लेकिन सूरजगढ़ से निकलने वाला निशान अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण विशेष महत्व रखता है।
कथाओं के अनुसार, लगभग 1779 में मुगल शासनकाल के दौरान जब खाटू मंदिर को ध्वस्त करने की साजिश रची गई, तब सूरजगढ़ के ठाकुर सूरजमल सिंह ने अपने योद्धाओं और श्रद्धालुओं के साथ तलवारें उठाईं। उन्होंने सूरजगढ़ से खाटू तक पदयात्रा कर तीन माह तक संघर्ष किया और मंदिर की रक्षा की।
इसी प्रकार अंग्रेजी शासनकाल में जब मंदिर के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया गया, तब मंगला भगत ने मोरछड़ी से ताले पर प्रहार कर उसे खोल दिया। इसके बाद से मंदिर कमेटी ने निर्णय लिया कि सूरजगढ़ का निशान पूरे वर्ष मुख्य शिखर पर लहराएगा।
सीकर जिले में स्थित सीकर का खाटू धाम आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। फाल्गुनी मेला यहां का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है। देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु बाबा श्याम के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते हैं।
हालांकि मेले का औपचारिक समापन हो गया है, लेकिन खाटू नगरी में अभी भी भक्तों की आवाजाही जारी है। कई श्रद्धालु होली के बाद तक रुकने का मन बना रहे हैं, जबकि कुछ चंद्रग्रहण के कारण वापस लौट गए।
खाटू की गलियां, बाजार और धर्मशालाएं अभी भी ‘श्याम नाम’ के जयकारों से गूंज रही हैं। मेले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बाबा श्याम की भक्ति का रंग कभी फीका नहीं पड़ता।
152 किलोमीटर की पदयात्रा, शिखर पर ध्वजा, भोग आरती और 15 लाख श्रद्धालुओं की आस्था—इन सबके साथ खाटू धाम का फाल्गुनी लक्खी मेला इस वर्ष भी यादगार बन गया। भले ही संख्या में कमी रही हो, लेकिन श्रद्धा और भक्ति का उत्साह कम नहीं हुआ। सूरजगढ़ का निशान आज भी त्याग, शौर्य और अटूट विश्वास का प्रतीक बनकर मंदिर शिखर पर लहरा रहा है।
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