करीब डेढ़ साल: के लंबे अंतराल और अंतरिम शासन के बाद बांग्लादेश में लोकतंत्र की वापसी के साथ बड़ा राजनीतिक बदलाव सामने आया है। 12 फरवरी को हुए 13वें संसदीय चुनाव के शुरुआती रुझानों में Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) ने स्पष्ट बढ़त बनाते हुए बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है।
299 सीटों पर हुए मतदान में बहुमत के लिए 150 सीटें जरूरी थीं और ताजा आंकड़ों के मुताबिक बीएनपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 151 सीटें जीत ली हैं। इस जीत के साथ ही पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई है।
बांग्लादेश की संसद, जिसे Jatiya Sangsad कहा जाता है, में कुल 300 सीटें हैं। इस बार 299 सीटों पर मतदान हुआ, क्योंकि शेरपुर-3 सीट पर एक उम्मीदवार के निधन के कारण चुनाव रद्द कर दिया गया।
बहुमत के लिए 150 सीटों की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जिनका आवंटन सामान्य सीटों पर पार्टियों के प्रदर्शन के आधार पर किया जाता है।
शुक्रवार सुबह 5 बजे तक आए रुझानों में बीएनपी गठबंधन 151 सीटों पर जीत दर्ज कर चुका था, जबकि Bangladesh Jamaat-e-Islami के नेतृत्व वाले गठबंधन को 43 सीटें मिली हैं।
यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। पहली बार देश की दो पूर्व प्रधानमंत्री चुनावी मैदान में नहीं थीं।
Sheikh Hasina, जो Awami League की प्रमुख हैं, छात्र आंदोलन के बाद सत्ता से हटाए जाने के पश्चात भारत में रह रही हैं। पार्टी का पंजीकरण निलंबित होने के कारण वे चुनाव नहीं लड़ सकीं।
दूसरी ओर, बीएनपी की पूर्व प्रमुख Khaleda Zia का दिसंबर में निधन हो गया था। ऐसे में पार्टी की कमान उनके बेटे Tarique Rahman ने संभाली, जो लगभग 17 वर्षों के निर्वासन के बाद देश लौटे हैं।
अब वे प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
बीएनपी ने 151 सीटें जीतकर बहुमत का आंकड़ा पार किया।
जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को 43 सीटें मिलीं।
299 सीटों पर मतदान हुआ, एक सीट पर चुनाव रद्द।
50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित।
शेख हसीना और खालिदा जिया चुनाव में शामिल नहीं थीं।
तारिक रहमान 17 साल बाद लौटे और पीएम पद के प्रमुख दावेदार बने।
छात्र आंदोलन से जुड़े संगठनों ने भी गठबंधन किया।
ढाका-3 से गायेश्वर चंद्र रॉय की जीत ऐतिहासिक मानी जा रही है।
‘जुलाई नेशनल चार्टर’ पर भी मतदान हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा जैसे प्रस्ताव शामिल हैं।
भारत इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए है।
भारत और बांग्लादेश के संबंधों में हाल के महीनों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। ऐसे में यह चुनाव दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय कर सकता है।
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने कहा है कि आधिकारिक नतीजों के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
नई सरकार की प्राथमिकताएं और विदेश नीति यह तय करेंगी कि दोनों देशों के रिश्ते किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।
तारिक रहमान को लंबे समय से बांग्लादेश की राजनीति में ‘डार्क प्रिंस’ कहा जाता रहा है। 17 वर्षों के निर्वासन के बाद उनकी वापसी और अब संभावित सत्ता तक पहुंच ने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं।
अगर आधिकारिक नतीजे इन्हीं रुझानों की पुष्टि करते हैं, तो बांग्लादेश में एक नई राजनीतिक पारी की शुरुआत तय मानी जा रही है।
18 महीनों के अंतराल के बाद हुए इस चुनाव ने बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा मोड़ ला दिया है। बीएनपी गठबंधन बहुमत के साथ सरकार बनाने की स्थिति में है और तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार बन चुके हैं।
अब सबकी नजर आधिकारिक घोषणा और नई सरकार की नीतियों पर टिकी है, जो देश की आंतरिक राजनीति के साथ-साथ क्षेत्रीय कूटनीति को भी नई दिशा दे सकती हैं।
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