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ISRO के मिशन में बड़ी गड़बड़! श्रीहरिकोटा से उड़े PSLV-C62 रॉकेट ने बीच रास्ते में खोया नियंत्रण; 'दिव्य दृष्टि' और 15 सैटेलाइट्स पर संकट

श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लिए साल 2026 का पहला ऑर्बिटल मिशन 'PSLV-C62' एक बड़ी चुनौती में बदल गया है। सोमवार सुबह 10:17 बजे सतीश धवन स्पेस सेंटर से रॉकेट ने अपनी 64वीं उड़ान तो शानदार ढंग से भरी, लेकिन मिशन के अंतिम चरणों में आई एक 'असामान्य स्थिति' (Anomaly) ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। भारत की 'दिव्य दृष्टि' कहे जाने वाले इस मिशन में 15 सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में तैनात किया जाना था, जो वर्तमान में अधर में लटक गया है।

तीसरे चरण (PS3) में आई खराबी इसरो ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि रॉकेट के तीसरे चरण (PS3) के अंत में स्थिति असामान्य हो गई। इसके कारण रॉकेट अपने निर्धारित रास्ते से भटक गया और सैटेलाइट्स को उनकी सटीक कक्षा (Orbit) में तैनात नहीं किया जा सका। इसरो चेयरमैन वी. नारायणन और उनकी टीम ने इस विफलता के विस्तृत विश्लेषण के आदेश दे दिए हैं।

मिशन के दो सबसे अहम किरदार:

  1. अन्वेषा (EOS-N1): यह एक बेहद ताकतवर 'स्पाई सैटेलाइट' है। हाइपरस्पेक्ट्रल रिमोट सेंसिंग (HRS) से लैस यह उपग्रह दुश्मन के ठिकानों की बारीक से बारीक तस्वीर लेने में सक्षम है। इसे भारत की सुरक्षा के लिए 'ब्रह्मास्त्र' माना जा रहा था।

  2. आयुलसैट (Aulusat): बेंगलुरु के स्टार्टअप 'ऑर्बिटएड' द्वारा बनाया गया यह 25 किलो का सैटेलाइट अंतरिक्ष में 'रिफ्यूलिंग' (ईंधन भरना) का ट्रायल करने वाला था। यदि यह सफल होता, तो चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन जाता जिसके पास अंतरिक्ष में स्पेसक्राफ्ट को फिर से भरने की तकनीक होती।

कमबैक की उम्मीदों को लगा झटका पिछले साल मई में एक पीएसएलवी मिशन के फेल होने के बाद, इसरो इस लॉन्च को एक 'कमबैक' (वापसी) के तौर पर देख रहा था। लॉन्च से पहले चेयरमैन वी. नारायणन ने तिरुपति मंदिर में पूजा-अर्चना भी की थी। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के माध्यम से ब्रिटेन और थाईलैंड के 14 विदेशी सैटेलाइट्स को भी इस मिशन का हिस्सा बनाया गया था, जिनका भविष्य अब अनिश्चित है।

क्या होता है रिफ्यूलिंग तकनीक का महत्व? आमतौर पर सैटेलाइट्स का जीवनकाल उनके ईंधन पर निर्भर करता है। ईंधन खत्म होते ही वे 'स्पेस जंक' (कचरा) बन जाते हैं। रिफ्यूलिंग तकनीक के जरिए उपग्रहों का जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है, जिससे अरबों डॉलर की बचत होती है। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देश भी फिलहाल इस तकनीक पर काम ही कर रहे हैं।


निष्कर्ष:

PSLV-C62 मिशन का रास्ते से भटकना भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक बड़ा सबक है। हालांकि इसरो अपने 'फेलियर एनालिसिस' के लिए दुनिया भर में मशहूर है, और उम्मीद है कि जल्द ही तकनीकी खामी का पता लगाकर भविष्य के मिशनों को सुरक्षित बनाया जाएगा। 'अन्वेषा' जैसी महत्वपूर्ण सैटेलाइट की सुरक्षा और आयुलसैट का रिफ्यूलिंग परीक्षण फिलहाल जांच के दायरे में हैं।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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