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गोंडा। कैसरगंज से पूर्व भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने सोशल मीडिया पर खुद की तुलना राजा भैया और अन्य क्षत्रिय नेताओं से किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। गोंडा में आयोजित राष्ट्रकथा के बाद क्षत्रिय समाज के “सबसे बड़े नेता” को लेकर चल रही बहस पर उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा— “ऐसी बकवासबाजी बंद करिए।”

बृजभूषण शरण सिंह ने स्पष्ट कहा कि राजा भैया उम्र में उनसे छोटे हैं और उनके पारिवारिक संबंध बेहद आत्मीय हैं।
उन्होंने कहा—
“राजा भैया मेरे छोटे भाई जैसे हैं, मेरे बच्चों के दोस्त हैं। अगर किसी को उनका इतिहास जानना है तो उनके पिता महाराज उदय सिंह का इतिहास पढ़िए। वो संघर्ष और विचारधारा के प्रतीक हैं और हम उन्हें अपना आदर्श मानते हैं।”

‘राजनाथ सिंह सबसे बड़े नेता’

उन्होंने साफ कहा कि तुलना की राजनीति समाज में भ्रम और विभाजन पैदा करती है।
बृजभूषण बोले—
“आज अगर कोई सबसे बड़े नेता हैं तो वो राजनाथ सिंह हैं। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। समाज को जोड़ने की बजाय इस तरह की बहसें समाज को तोड़ने का काम कर रही हैं।”

सोशल मीडिया पर नाराजगी

बृजभूषण शरण सिंह ने सोशल मीडिया पर चल रही पोस्ट्स का जिक्र करते हुए कहा कि पहले भी “अभय सिंह बड़े या धनंजय सिंह बड़े” जैसी बहसें कराई जाती रही हैं।
उन्होंने सवाल उठाया—
“आप कौन होते हैं तय करने वाले कि कौन बड़ा है और कौन छोटा? इससे समाज को क्या मिलता है?”

उन्होंने हाथ जोड़ते हुए अपील की कि राष्ट्रकथा जैसे आयोजनों को विवाद का माध्यम न बनाया जाए।
“यह कथा समाज को जोड़ने के लिए थी, तोड़ने के लिए नहीं। जिसे जैसी भावना होगी, उसे वैसा ही दिखाई देगा।”

राष्ट्रकथा में जुटी थीं बड़ी हस्तियां

गौरतलब है कि गोंडा-अयोध्या बॉर्डर पर 1 से 8 जनवरी तक आयोजित राष्ट्रकथा में राजनीतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जगत की कई नामचीन हस्तियां शामिल हुई थीं।
इसमें जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, यूपी सरकार के मंत्री सूर्य प्रताप शाही, अरविंद कुमार शर्मा, दिनेश प्रताप सिंह समेत कई नेता पहुंचे थे।
हालांकि, योगी सरकार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस आयोजन से दूरी बनाए रखी थी, जिसे लेकर राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा रही।


निष्कर्ष:

बृजभूषण शरण सिंह का बयान साफ संकेत देता है कि वे क्षत्रिय समाज में नेतृत्व की तुलना को गैरजरूरी और विभाजनकारी मानते हैं। उनका जोर नेतृत्व की होड़ के बजाय सामाजिक एकता और वैचारिक मजबूती पर है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि राजनीति में व्यक्तित्व नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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