राजस्थान: के दौसा में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission) द्वारा जारी ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संवर्द्धन विनियम 2026’ को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों ने इन नियमों का विरोध करते हुए सड़क पर उतरने का ऐलान किया है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पदाधिकारियों ने स्पष्ट कहा कि यदि सरकार ने इन नियमों को वापस नहीं लिया, तो आंदोलन को बड़ा और उग्र रूप दिया जाएगा। 27 फरवरी को मशाल जुलूस और 1 मार्च को जिला मुख्यालय पर आक्रोश रैली निकालने की घोषणा की गई है।
आंदोलनकारियों ने बताया कि 1 मार्च को आक्रोश रैली सहजनाथ महादेव मंदिर से शुरू होकर कलेक्ट्रेट तक पहुंचेगी। इस दौरान जिलेभर से बड़ी संख्या में लोगों को शामिल करने का दावा किया गया है।
27 फरवरी को शाम के समय मशाल जुलूस निकाला जाएगा, जिसके माध्यम से जनजागरण और विरोध दर्ज कराया जाएगा। आयोजकों का कहना है कि यह केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला आंदोलन होगा।
गौड़ सनाढ्य ब्राह्मण महासभा के जिलाध्यक्ष वैद्य लक्ष्मीकांत शर्मा ने कहा कि किसी भी नियम या कानून में न्याय, संतुलन और सभी वर्गों की समान सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और संस्थाओं की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि यदि यूजीसी द्वारा जारी विनियमों में संशोधन या वापसी नहीं की गई, तो यह आंदोलन जिला स्तर से आगे प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जाएगा।
शर्मा ने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में शैक्षणिक वातावरण को संतुलित रखना आवश्यक है। यदि कोई नियम समाज के एक वर्ग को असुरक्षित महसूस कराता है, तो उस पर पुनर्विचार होना चाहिए।
वैश्य महासम्मेलन के जिलाध्यक्ष मनोहर लाल गुप्ता ने प्रेस वार्ता में कहा कि इस नियम का दुरुपयोग होने की आशंका है। उन्होंने इसे “काला कानून” बताते हुए कहा कि यदि इसे लागू रखा गया तो सवर्ण समाज के छात्र-छात्राओं में असुरक्षा की भावना बढ़ेगी।
उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी दिशाहीन हो सकती है, क्योंकि शैक्षणिक संस्थानों में संतुलन और निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। यदि छात्र स्वयं को अन्याय का शिकार मानने लगेंगे तो शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित होगा।
घनश्याम शर्मा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने बिना व्यापक जनसंवाद के यह नियम लागू कर दिए। उन्होंने कहा कि एक तरफ सामाजिक एकता की बात की जाती है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे प्रावधान लाकर समाज को जातियों में बांटने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के नियमों से शैक्षणिक परिसरों में अनावश्यक तनाव और विवाद की स्थिति बन सकती है।
माधो सिंह, आलोक जैन समेत अन्य वक्ताओं ने कहा कि यह नियम संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार की भावना के विपरीत है। उनका कहना है कि वर्षों से चला आ रहा शैक्षणिक संतुलन बिगड़ सकता है और सामान्य वर्ग के छात्रों को हाशिये पर धकेले जाने का खतरा पैदा हो सकता है।
उन्होंने फर्जी शिकायतों और नियमों के संभावित दुरुपयोग की आशंका भी जताई। वक्ताओं का कहना था कि यदि शिकायत तंत्र पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं होगा, तो निर्दोष छात्र-छात्राएं भी प्रताड़ना का शिकार हो सकते हैं।
यूजीसी द्वारा प्रस्तावित/जारी किए गए इस विनियम का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता, समावेशन और भेदभाव-निवारण सुनिश्चित करना बताया गया है।
इन नियमों के तहत संस्थानों में शिकायत निवारण तंत्र को सुदृढ़ करने, भेदभाव के मामलों की निगरानी और कार्रवाई के लिए दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। हालांकि विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि कुछ प्रावधानों की भाषा अस्पष्ट है और इससे गलत व्याख्या की गुंजाइश बनती है।
आंदोलन को सफल बनाने के लिए सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों ने जनसंपर्क अभियान शुरू कर दिया है। गांव-गांव और वार्ड स्तर पर बैठकें की जा रही हैं।
आयोजकों का दावा है कि 1 मार्च की रैली में हजारों लोग शामिल होंगे। प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर नियमों की वापसी की मांग की जाएगी।
आक्रोश रैली और मशाल जुलूस को देखते हुए प्रशासन भी सतर्क है। कलेक्ट्रेट परिसर और प्रमुख मार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाए जाने की संभावना है। पुलिस और जिला प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे।
UGC के नियमों को लेकर देशभर में विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ शिक्षाविद् इसे समावेशन की दिशा में सकारात्मक कदम मानते हैं, तो कुछ इसे विवादास्पद बताते हैं।
दौसा में उठी आवाज ने इस बहस को स्थानीय स्तर पर भी तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार या आयोग की ओर से कोई स्पष्टीकरण या संशोधन जारी किया जाता है।
यदि आंदोलन व्यापक समर्थन हासिल करता है, तो इसका असर प्रदेश की राजनीति और शिक्षा नीति पर भी पड़ सकता है। त्योहारों और परीक्षाओं के मौसम के बीच इस प्रकार का आंदोलन प्रशासन के लिए चुनौती बन सकता है।
आंदोलनकारी संगठनों ने स्पष्ट किया है कि उनका विरोध शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन मांगों की अनदेखी हुई तो चरणबद्ध तरीके से आंदोलन तेज किया जाएगा।
दौसा में UGC के ‘समानता संवर्द्धन विनियम 2026’ को लेकर शुरू हुआ विरोध अब संगठित आंदोलन का रूप लेता दिख रहा है। 27 फरवरी का मशाल जुलूस और 1 मार्च की आक्रोश रैली इस आंदोलन की दिशा तय करेंगे।
एक तरफ सरकार और आयोग का उद्देश्य उच्च शिक्षा में समानता और समावेशन सुनिश्चित करना बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ वर्ग इसे अपने अधिकारों के विरुद्ध मान रहे हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या संवाद और संशोधन के जरिए समाधान निकलता है या आंदोलन और तेज होता है।
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