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अमेरिका ने संकेत दिया: भारत पर 25% टैरिफ हट सकता है, रूस से तेल खरीद में कमी को बताया बड़ी जीत

वॉशिंगटन डीसी/न्यूयॉर्क: अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ में से आधा यानी 25% टैरिफ हटाने पर विचार कर सकता है। बेसेंट ने यह टिप्पणी गुरुवार को अमेरिकी मीडिया वेबसाइट पॉलिटिको को दिए इंटरव्यू में की।

बेसेंट ने कहा कि भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना काफी घटा दिया है, इसलिए अब टैरिफ में राहत देने की संभावना बन रही है। उन्होंने इसे अमेरिका की बड़ी जीत बताया और कहा कि टैरिफ ने भारत की रूस से तेल खरीद घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

अमेरिका ने भारत पर टैरिफ लगाया था

अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत पर दो बार टैरिफ लगाया था। पहली बार 1 अगस्त को व्यापार घाटे के कारण 25% टैरिफ लगाया गया, जबकि 27 अगस्त को रूस से तेल खरीद के कारण फिर से 25% टैरिफ लगाया गया।

ट्रम्प प्रशासन ने अप्रैल 2025 में ग्लोबल टैरिफ नीति लागू की थी, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने पर 500% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव भी सामने आया था। हालांकि बेसेंट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रम्प को यह कदम लेने की तत्काल आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनके पास IEEPA कानून के तहत राष्ट्रीय आपात स्थिति का हवाला देकर आर्थिक प्रतिबंध लगाने का अधिकार है।

यूरोप पर आरोप: भारत से तेल खरीदकर रूस की मदद

बेसेंट ने यूरोपीय देशों पर आरोप लगाया कि वे भारत से रिफाइंड तेल खरीदकर रूस की मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूरोप भारत पर टैरिफ इसलिए नहीं लगा रहा क्योंकि वे भारत के साथ बड़े व्यापार समझौते करना चाहते हैं।

भारत की रूस से तेल खरीद में गिरावट

रूस से भारत का तेल आयात दिसंबर 2025 में तीसरे स्थान पर खिसक गया। दिसंबर में भारत ने रूस से लगभग 2.3 बिलियन यूरो (23,000 करोड़ रुपए) का तेल आयात किया, जबकि तुर्की ने 2.6 बिलियन यूरो का तेल खरीदकर भारत को पीछे छोड़ दिया। वहीं, चीन अब भी रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बना हुआ है, जिसने दिसंबर में 6 बिलियन यूरो का तेल खरीदा।

भारत की रूस से तेल खरीद में गिरावट का मुख्य कारण रिलायंस इंडस्ट्रीज रही, जिसने जामनगर रिफाइनरी के लिए रूस से तेल खरीद लगभग आधा कर दी। सरकारी तेल कंपनियों ने भी दिसंबर में रूस से आयात 15% घटा दिया।

क्यों घट रही है रूस से तेल की खरीद?

यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदना शुरू किया था। युद्ध से पहले भारत का रूस से आयात बहुत कम था, लेकिन युद्ध के बाद भारत इसका बड़ा खरीदार बन गया।

हालांकि, अब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत घटकर 63 डॉलर प्रति बैरल हो गई है, जबकि रूस की छूट केवल 1.5–2 डॉलर प्रति बैरल रह गई है। इसके अलावा शिपिंग और बीमा खर्च भी बढ़ गया है। इन कारणों से भारत अब सऊदी, UAE और अमेरिका जैसे स्थिर और भरोसेमंद सप्लायर्स से तेल खरीदना बढ़ा रहा है।

भारत का रुख

भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने देश के हितों के अनुसार तेल की खरीद जारी रखेगी। विदेश मंत्रालय और वित्त मंत्री ने कहा कि भारत अपनी एनर्जी पॉलिसी देश के हित और अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों के अनुसार तय करेगा।

रूस से भुगतान की चुनौतियाँ

भारत ने पिछले दो साल में रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदा है, जिससे रूस के पास काफी भारतीय रुपए जमा हो गए हैं। क्योंकि रुपया इंटरनेशनल लेवल पर सामान्य रूप से स्वीकार्य नहीं है, रूस इसे अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में आसानी से उपयोग नहीं कर सकता। अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों के कारण पेमेंट प्रक्रिया और जटिल हो गई है।


निष्कर्ष:

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बयान से यह संकेत मिलता है कि भारत-अमेरिका के व्यापार संबंधों में नरमी आ सकती है। भारत की रूस से तेल खरीद घटने के बाद अमेरिका टैरिफ में राहत देने के लिए सकारात्मक है। वहीं भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कहा है कि वह अपनी एनर्जी पॉलिसी के अनुसार निर्णय लेगा। यह स्थिति दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण और रणनीतिक सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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