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जलती चिताओं की राख में रंगा काशी! मणिकर्णिका घाट पर ‘मसाने की होली’, नरमुंडों के साथ नाचे नागा—3 लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे

काशी: आम तौर पर लोग चिता की राख से दूरी बनाते हैं। लेकिन काशी में यही राख आस्था और आध्यात्मिक उत्सव का प्रतीक बन जाती है। शनिवार को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित पवित्र मणिकर्णिका घाट पर ‘मसाने की होली’ का अद्भुत और रोमांचक दृश्य देखने को मिला। जलती चिताओं के बीच, रोते-बिलखते परिजनों के साथ गुजरती शवयात्राओं के बीच, नागा साधु और संन्यासी चिता की भस्म से होली खेलते नजर आए।

घाट की संकरी गलियों से लेकर सीढ़ियों तक, हर तरफ राख उड़ रही थी। कोई गले में नरमुंडों की माला डाले था, तो कोई पूरे शरीर पर भस्म लगाकर डमरू की थाप पर झूम रहा था। “नमः पार्वती… हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठा।


क्या है मसाने की होली?

मसाने की होली, काशी की सदियों पुरानी परंपरा है। मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं श्मशान में विराजते हैं और उन्हें भस्म प्रिय है। इसलिए होली से पहले श्मशान घाट पर चिता की राख से होली खेली जाती है। यह उत्सव मृत्यु को भी जीवन के उत्सव का हिस्सा मानने की आध्यात्मिक सोच को दर्शाता है।

इस दिन साधु-संन्यासी पहले बाबा मसान नाथ का पूजन करते हैं। भस्म, रंग, गुलाल और अबीर अर्पित करने के बाद चिता की राख से होली खेली जाती है। यह रंगोत्सव डमरू वादन से शुरू होता है।


डमरू की गूंज और त्रिशूल का नृत्य

शनिवार सुबह जैसे ही डमरू की आवाज गूंजी, नागा संन्यासी समूहों में घाट की ओर बढ़ने लगे। कुछ ने शरीर पर केवल भस्म लगाई थी, कुछ ने गले में नरमुंड की माला धारण की थी। त्रिशूल लहराते हुए वे घाट की सीढ़ियों पर पहुंचे और पूजन के बाद होली शुरू हुई।

चिता के बुझने का इंतजार करते संन्यासी, राख ठंडी होते ही उसे अपने शरीर पर मलते और फिर एक-दूसरे पर उछालते नजर आए। कई साधुओं ने अपने चेहरे पर आधुनिक चश्मा भी लगाया था—परंपरा और आधुनिकता का अनोखा संगम दिखाई दे रहा था।


शवयात्राओं के बीच भी जारी रहा उत्सव

सबसे अनोखा दृश्य तब देखने को मिला, जब एक ओर शवयात्रा घाट पर पहुंच रही थी और दूसरी ओर भस्म की होली खेली जा रही थी। रंग और राख के बीच से गुजरती अर्थियां इस बात का प्रतीक थीं कि काशी में जीवन और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं।

लोगों के चेहरे पर आंसू भी थे और आस्था की चमक भी। इस दृश्य ने विदेशी पर्यटकों को भी स्तब्ध कर दिया।


3 लाख से ज्यादा श्रद्धालु और पर्यटक

प्रशासन के मुताबिक, इस बार मसाने की होली में लगभग 3 लाख से ज्यादा श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचे। घाट की गलियों में भारी भीड़ उमड़ी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने कई रास्तों को अस्थायी रूप से बंद किया।

ड्रोन कैमरों से पूरे आयोजन की निगरानी की गई। मणिकर्णिका घाट की ओर जाने वाले मार्ग पर बैरिकेडिंग की गई। कुछ स्थानों पर लोगों और पुलिस के बीच बहस भी हुई, लेकिन कुल मिलाकर व्यवस्था नियंत्रण में रही।


विदेशी पर्यटक भी हुए सराबोर

रंग और चिता की राख में सराबोर विदेशी पर्यटक भी झूमते नजर आए। कई विदेशी श्रद्धालुओं ने नागा साधुओं के साथ भस्म लगवाई और जयकारे लगाए। उनके लिए यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव था।

कुछ पर्यटक इस दृश्य को कैमरे में कैद करते नजर आए, तो कुछ खुद इस अनोखे रंगोत्सव का हिस्सा बन गए।


नागा साधुओं की विशेष उपस्थिति

नागा साधु इस आयोजन का मुख्य आकर्षण रहे। पूरे शरीर पर चिता भस्म लगाए, त्रिशूल और डमरू के साथ वे शिवभक्ति में लीन नजर आए। नरमुंडों की माला पहने कुछ साधुओं ने श्मशान की परंपरा और वैराग्य का संदेश दिया।

उनका कहना था कि मृत्यु से डरना नहीं, उसे स्वीकार करना ही सच्चा वैराग्य है। मसाने की होली इसी दर्शन को जीवंत करती है।


काशी की आध्यात्मिक पहचान

काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां मृत्यु होने पर आत्मा को मुक्ति मिलती है। इसी कारण मणिकर्णिका घाट 24 घंटे जलने वाली चिताओं के लिए प्रसिद्ध है।

मसाने की होली इस विश्वास को और गहरा करती है कि जीवन और मृत्यु एक ही चक्र के दो पहलू हैं। यहां मृत्यु भी उत्सव का हिस्सा बन जाती है।


सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था

भीड़ को देखते हुए पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहे। घाट की ओर जाने वाले रास्तों पर रस्सी लगाकर बैरिकेडिंग की गई। ड्रोन कैमरों से निगरानी की गई। मेडिकल टीम और एंबुलेंस भी तैनात रहे।

प्रशासन ने अपील की कि लोग सावधानी बरतें और घाट की मर्यादा बनाए रखें।


सोशल मीडिया पर वायरल दृश्य

मणिकर्णिका घाट से भस्म की होली के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। “हर-हर महादेव” के जयकारों और उड़ती राख के दृश्य ने लोगों को रोमांचित कर दिया है।

कई लोगों ने इसे भारत की आध्यात्मिक विविधता और अनूठी परंपरा का प्रतीक बताया।


आगे क्या?

मसाने की होली के बाद काशी में पारंपरिक रंगों की होली का उत्सव मनाया जाएगा। लेकिन भस्म की यह होली सबसे अनोखी और रहस्यमयी मानी जाती है।

यह आयोजन केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु के दार्शनिक अर्थ को समझने का अवसर भी है।


निष्कर्ष:

मणिकर्णिका घाट पर मसाने की होली एक ऐसा दृश्य है, जहां आस्था, वैराग्य और उत्सव एक साथ दिखाई देते हैं। जलती चिताओं की राख से होली खेलते नागा साधु, डमरू की गूंज, और शवयात्राओं के बीच गूंजते जयकारे—यह सब मिलकर काशी की अनोखी पहचान को दर्शाते हैं।

3 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं और पर्यटकों की मौजूदगी ने इस आयोजन को और भव्य बना दिया। काशी ने एक बार फिर दुनिया को दिखा दिया कि यहां जीवन और मृत्यु दोनों ही उत्सव हैं।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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