राजस्थान: की राजधानी जयपुर एक बार फिर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बना, जब सीकर रोड स्थित भवानी शिक्षा निकेतन में अखिल भारतीय मठ-पीठाधीश्वर समागम एवं शास्त्र संरक्षण समारोह का भव्य आयोजन किया गया। इस समारोह में देशभर से आए संत-महात्माओं, आचार्यों और विद्वानों ने मिलकर करीब 15 लाख दुर्लभ पांडुलिपियों और ग्रंथों के संरक्षण का ऐतिहासिक संकल्प लिया।
कार्यक्रम का आयोजन श्रीमद्जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य महाप्रभु के 825वें प्राकट्य उत्सव पर आयोजित नौ दिवसीय 108 कुण्डीय श्रीराम महायज्ञ के अवसर पर किया गया। यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बनकर उभरा। समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से 215 पांडुलिपि धारकों ने भाग लिया, जबकि चार संस्थाओं के 60 केंद्र ज्ञान भारतम् मिशन से जुड़े।
समारोह के मंच पर स्वामी राजेन्द्रदास देवाचार्य, जगद्गुरु स्वामी रामकृष्णाचार्य, महामंडलेश्वर डॉ. गणेशदास, महंत वैष्णव हरिशंकर दास, स्वामी अवतार पुरी, स्वामी ज्ञानेश्वर पुरी और पं. महेश दत्त शर्मा सहित कई संतों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
स्वामी राजेन्द्रदास देवाचार्य ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा हमारे शास्त्रों में बसती है। यदि ये ग्रंथ सुरक्षित नहीं रहेंगे तो आने वाली पीढ़ियां अपने मूल से कट जाएंगी। उन्होंने बताया कि रैवासा धाम के माध्यम से संत साहित्य को भारत सरकार के सहयोग से सुरक्षित रखने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
अध्यक्षता कर रहे जगद्गुरु स्वामी रामकृष्णाचार्य ने कहा कि यह पहल सनातन परंपरा को संरक्षित और सशक्त बनाने की दिशा में ऐतिहासिक साबित होगी। उन्होंने डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया को समय की मांग बताया।
कार्यक्रम में यह निर्णय लिया गया कि दुर्लभ पांडुलिपियों का डिजिटल स्कैनिंग कर सुरक्षित संग्रह तैयार किया जाएगा। इससे न केवल ग्रंथों को भौतिक क्षति से बचाया जा सकेगा, बल्कि शोधार्थियों और विद्वानों को भी अध्ययन के लिए डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराया जा सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि देशभर में हजारों ऐसी पांडुलिपियां निजी संरक्षण में हैं, जो मौसम, कीट या समय के प्रभाव से नष्ट होने की कगार पर हैं। डिजिटल रिकॉर्ड बनने के बाद इन अमूल्य ग्रंथों को वैश्विक स्तर पर भी संरक्षित किया जा सकेगा।
समारोह की शुरुआत दीप प्रज्वलन के साथ हुई। स्वागत भाषण प्रो. सोमदेव शास्त्री ने दिया। इस अवसर पर ‘श्रीराम परत्वम्’ और ‘श्री दादूदर्शन भारतीय लिपि के इतिहास’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का विमोचन भी किया गया।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक के शंकराचार्य, पीठाधीश्वर, महामंडलेश्वर और महंतों की उपस्थिति ने इस आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। संत समाज ने एक स्वर में शास्त्र संरक्षण और सांस्कृतिक जागरूकता को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में लाखों प्राचीन पांडुलिपियां संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध हैं। इनमें चिकित्सा, ज्योतिष, दर्शन, गणित, वास्तु और आध्यात्मिक ज्ञान का विशाल भंडार समाहित है। यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया तो यह धरोहर सदा के लिए खो सकती है।
जयपुर से शुरू हुआ यह अभियान अब राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित होने की तैयारी में है। ज्ञान भारतम् मिशन के माध्यम से पांडुलिपियों की सूचीकरण, डिजिटलीकरण और सुरक्षित भंडारण की कार्ययोजना बनाई जा रही है।
जयपुर में आयोजित यह समागम केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को बचाने का राष्ट्रव्यापी आंदोलन है। 15 लाख दुर्लभ पांडुलिपियों का डिजिटल संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर साबित होगा। यदि यह अभियान सफल रहा तो भारत का प्राचीन ज्ञान भंडार सुरक्षित और सुलभ दोनों होगा।
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