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पहले नौकरी दी, फिर निकाला… अब कोर्ट का झटका! हाईकोर्ट बोला—गलती आपकी, कर्मचारी क्यों भुगते?

राजस्थान: में एक अहम फैसले में Rajasthan High Court ने एक सफाई कर्मचारी को बड़ी राहत देते हुए उसकी बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर नियुक्ति में कोई त्रुटि हुई है, तो इसकी जिम्मेदारी नियोक्ता की है, न कि कर्मचारी की।

यह मामला Jaipur नगर निगम में कार्यरत सफाईकर्मी जितेंद्र मीणा से जुड़ा है, जिसे 2018 में नौकरी दी गई थी। लेकिन करीब साढ़े चार साल की सेवा के बाद निगम ने यह कहते हुए उसे बर्खास्त कर दिया कि नियुक्ति के समय उसकी उम्र 18 वर्ष से कम थी।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार, 2018 में निकली सफाई कर्मचारी भर्ती में शर्त थी कि 1 जनवरी 2019 तक अभ्यर्थी की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। जितेंद्र मीणा ने आवेदन किया और चयन प्रक्रिया में सफल भी रहे।

उन्हें 7 सितंबर 2018 को नियुक्ति दी गई, उस समय उनकी उम्र करीब 17 साल 4 महीने थी। वहीं 1 जनवरी 2019 को उनकी उम्र 17 साल 8 महीने थी, यानी वे निर्धारित आयु सीमा से कुछ महीने कम थे।

साढ़े चार साल बाद कार्रवाई

निगम ने शुरुआत में इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया और कर्मचारी को काम करने दिया। लेकिन बाद में जब दस्तावेजों की समीक्षा की गई, तो यह मुद्दा सामने आया। इसके बाद 20 फरवरी 2023 को उन्हें बर्खास्त कर दिया गया।

इस फैसले को चुनौती देते हुए जितेंद्र मीणा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट ने क्या कहा?

Rajasthan High Court ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता ने नियुक्ति के समय कोई तथ्य नहीं छिपाया था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आवेदन पत्र, चयन प्रक्रिया और नियुक्ति के दौरान सभी दस्तावेजों की जांच करना नियोक्ता की जिम्मेदारी होती है। अगर यह जांच समय पर नहीं की गई, तो इसका खामियाजा कर्मचारी को नहीं भुगतना चाहिए।

प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन

कोर्ट ने यह भी पाया कि कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया, जो कि “प्राकृतिक न्याय” के सिद्धांत का उल्लंघन है।

इस आधार पर कोर्ट ने न केवल बर्खास्तगी को रद्द किया, बल्कि कर्मचारी को सभी परिलाभों के साथ दोबारा नौकरी पर बहाल करने का आदेश भी दिया।

निगम की दलील क्या थी?

नगर निगम की ओर से कोर्ट में कहा गया कि नियुक्ति लिपिकीय त्रुटि के कारण हुई थी और अभ्यर्थी आयु सीमा पूरी नहीं करता था, इसलिए उसे सेवा में बने रहने का अधिकार नहीं है।

हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि प्रशासनिक गलती का भार कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता।

क्या है इस फैसले का महत्व?

यह फैसला सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता और जिम्मेदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि नियुक्ति प्रक्रिया में लापरवाही करने वाले विभाग बाद में कर्मचारियों पर दोष नहीं मढ़ सकते।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में एक मिसाल बनेगा, जहां कर्मचारियों को प्रशासनिक गलतियों के कारण नुकसान उठाना पड़ता है।


निष्कर्ष:

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल एक कर्मचारी को न्याय दिलाने वाला है, बल्कि यह सरकारी तंत्र को भी जिम्मेदारी निभाने का संदेश देता है। Rajasthan High Court ने स्पष्ट कर दिया है कि नियमों की अनदेखी का खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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