राजसमंद। जिले में दुर्लभ पक्षी प्रजातियों की मौजूदगी का एक और रोचक प्रमाण सामने आया है। केंद्रीय विद्यालय राजसमंद के पास एमडी और धोइन्दा के बीच क्षेत्र में मोटल्ड वुड उल्लू दिखाई दिया, जिसे प्रकृति प्रेमी सूर्यकांत जोशी ने अपने कैमरे में कैद किया। स्थानीय ग्रामीण इस उल्लू को ‘घुष्घू’ के नाम से जानते हैं।
मोटल्ड वुड उल्लू की पहचान इसकी काली आंखों के चारों ओर बने लाल घेरे, भारी-भरकम शरीर और पेड़ की टहनियों जैसी रंगत व बनावट से होती है। इसकी यही विशेषता इसे प्राकृतिक वातावरण में लगभग अदृश्य बना देती है। जंगलों में निवास करने के बावजूद आम लोगों को इसकी झलक बहुत कम मिलती है।
भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-एक के तहत मोटल्ड वुड उल्लू को संरक्षित प्रजाति घोषित किया गया है। इसके शिकार या तस्करी पर कम से कम तीन वर्ष अथवा उससे अधिक कारावास का प्रावधान है। राजसमंद क्षेत्र में इस उल्लू की उपस्थिति जिले की समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का महत्वपूर्ण संकेत है।
प्रकृति प्रेमी सूर्यकांत जोशी ने बताया कि मोटल्ड वुड उल्लू एक रात्रिचर और संवेदनशील पक्षी है। यह रात के समय सक्रिय रहता है और सुबह होने से पहले अपने घोंसले में लौट जाता है। अंधेरे में इसकी दृष्टि बेहद तीव्र होती है, जिससे यह आसानी से शिकार करता है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार मोटल्ड वुड उल्लू पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका प्रमुख भोजन छोटे स्तनधारी जैसे चूहे होते हैं, साथ ही मेंढक, छिपकली, सांप, मछली, खरगोश, गिलहरी और छोटे पक्षियों का शिकार भी करता है। राजस्थान में उल्लूओं की अन्य प्रजातियों में रॉक ईगल आउल, बंगाल ईगल आउल, डस्की ईगल आउल, सफेद उल्लू/बार्न आउल, इंडियन स्कॉप्स आउल, शॉर्ट इयर्ड आउल, लोंग इयर्ड आउल और ब्राउन फिश आउल शामिल हैं।
इस दुर्लभ उल्लू की उपस्थिति न केवल जैव विविधता का उत्सव है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव जागरूकता के लिए भी एक प्रेरक उदाहरण है।
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