भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर द्वारा जारी डेजर्टिफिकेशन एंड लैंड डिग्रेडेशन एटलस ऑफ इंडिया (2018–19) के अनुसार भारत में भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। रिपोर्ट बताती है कि देश के कुल 328.72 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से लगभग 29.77 प्रतिशत यानी 97.85 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। यह अध्ययन उपग्रह आधारित मानचित्रण और जियोस्पेशियल तकनीक पर आधारित है।
रिपोर्ट के अनुसार पिछले 15 वर्षों में प्रभावित क्षेत्र में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2003–05 में यह 94.53 मिलियन हेक्टेयर था, जो 2011–13 में बढ़कर 96.40 मिलियन हेक्टेयर और 2018–19 में 97.85 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच गया। इस तरह लगभग 3.32 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि इस श्रेणी में शामिल हुई है।
इसरो के अनुसार देश में भूमि क्षरण का सबसे बड़ा कारण जल अपरदन है, जो कुल क्षेत्र का लगभग 11.01 प्रतिशत प्रभावित करता है। इसके बाद वनस्पति क्षरण (9.15 प्रतिशत) और वायु अपरदन (5.46 प्रतिशत) प्रमुख कारण हैं। पश्चिमी राजस्थान के शुष्क क्षेत्र जैसे जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर वायु अपरदन से सबसे अधिक प्रभावित माने जाते हैं, जहां तेज हवाएं उपजाऊ मिट्टी को लगातार नुकसान पहुंचाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या से कृषि उत्पादन, चारागाह, वनस्पति आवरण और पारिस्थितिक संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इसके समाधान के लिए हरित आवरण बढ़ाने, जल संरक्षण, चारागाह विकास और टिकाऊ भूमि प्रबंधन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भी वैश्विक स्तर पर भूमि क्षरण एक बड़ी चुनौती बन चुका है, जो खाद्य सुरक्षा और आजीविका को प्रभावित कर रहा है। भारत ने 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन का लक्ष्य रखा है, जिसमें अब तक लगभग 21.76 मिलियन हेक्टेयर भूमि का पुनर्स्थापन किया जा चुका है, जो लक्ष्य का लगभग 84 प्रतिशत है।
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