राजस्थान: के दौसा जिले में न्याय के साथ मानवीय संवेदनशीलता की एक मिसाल सामने आई है, जहां अदालत ने केवल कानूनी फैसला ही नहीं सुनाया, बल्कि एक पीड़ित के भविष्य को भी सुरक्षित करने की पहल की।
जिला एवं सत्र न्यायाधीश केशव कौशिक ने एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल और चलने-फिरने में असमर्थ पीड़ित सियाराम के मामले में ऐसा निर्णय लिया, जिसने न्यायपालिका के मानवीय चेहरे को उजागर कर दिया।
यह मामला सियाराम बनाम ज्ञानसिंह व अन्य से जुड़ा है, जिसमें पीड़ित सियाराम को रीढ़ की गंभीर चोटों के कारण चलने-फिरने में असमर्थता हो गई थी। वह अदालत में उपस्थित होने की स्थिति में नहीं था।
ऐसे में केशव कौशिक खुद कोर्ट कक्ष से बाहर आए और नीचे खड़ी गाड़ी में जाकर पीड़ित से मुलाकात की। उन्होंने न केवल उसकी स्थिति को समझा, बल्कि उससे बातचीत कर उसकी जरूरतों और भविष्य की चिंताओं को भी जाना।
इस मामले में पहले ही राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के तहत बीमा कंपनी को एमएसीटी अवार्ड के अतिरिक्त 16 लाख 51 हजार 392 रुपये देने के निर्देश दिए गए थे।
आदेश के पालन में बीमा कंपनी ने ब्याज सहित कुल 29 लाख 52 हजार 670 रुपये की राशि जमा कराई।
लेकिन यहां न्यायाधीश ने केवल मुआवजा दिलाने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि यह राशि पीड़ित के भविष्य के लिए स्थायी सहारा बन सके।
पीड़ित सियाराम, जो लालसोट क्षेत्र के पट्टी सुल्तानपुरा का निवासी है, ने न्यायाधीश को बताया कि वह अपने माता-पिता के साथ रहता है और चाहता है कि उसे हर महीने 20 से 25 हजार रुपये की स्थायी आय मिलती रहे।
इस पर तत्काल कार्रवाई करते हुए न्यायाधीश ने बैंक अधिकारी को मौके पर बुलवाया और एक ऐसी निवेश योजना तैयार करवाई, जिससे पूरी राशि सुरक्षित रूप से निवेशित हो सके और पीड़ित को जीवनभर नियमित मासिक आय मिलती रहे।
इस फैसले ने यह साबित कर दिया कि न्याय केवल कानून की सीमाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें मानवीय संवेदनाएं भी शामिल होती हैं।
अदालत का यह कदम न केवल पीड़ित के लिए राहत भरा है, बल्कि समाज के लिए भी एक सकारात्मक संदेश है कि न्यायपालिका जरूरतमंदों के साथ खड़ी है।
इस दौरान जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव संतोष अग्रवाल, अधिवक्ता सुदीप मिश्रा, न्यायालय स्टाफ और पीड़ित के परिजन भी मौजूद रहे।
सभी ने इस पहल की सराहना की और इसे एक आदर्श उदाहरण बताया।
आमतौर पर अदालतें मुआवजा तय कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर देती हैं, लेकिन इस मामले में न्यायाधीश ने आगे बढ़कर यह सुनिश्चित किया कि पीड़ित उस राशि का सही उपयोग कर सके और भविष्य में आर्थिक रूप से सुरक्षित रह सके।
यह पहल विशेष रूप से उन मामलों के लिए प्रेरणादायक है, जहां पीड़ित शारीरिक रूप से असमर्थ होता है और उसे लंबे समय तक आर्थिक सहायता की जरूरत होती है।
दौसा कोर्ट का यह फैसला न्याय के साथ-साथ संवेदनशीलता का अनोखा उदाहरण है। जिला जज केशव कौशिक की पहल ने यह दिखाया कि अगर न्यायपालिका चाह ले, तो वह किसी की जिंदगी को नई दिशा दे सकती है। यह मामला आने वाले समय में न्यायिक व्यवस्था के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल बन सकता है।
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