जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया। कोर्ट ने दोनों पक्षों को आठ दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है।
महावीरजी जैन मंदिर के प्रबंधन को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर जैन संप्रदायों के बीच विवाद चल रहा है। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं।
श्वेतांबर समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि विवाद मंदिर की धार्मिक पहचान या स्वरूप को बदलने को लेकर नहीं है, बल्कि मंदिर के प्रबंधन को लेकर है। उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 लागू नहीं होता।
वहीं, दिगंबर समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने दलील दी कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही समाप्त किए जाने के बाद हाईकोर्ट में अपील का प्रावधान नहीं है। उनके मुताबिक ऐसी स्थिति में रिट याचिका दायर की जानी चाहिए थी।
दिगंबर समिति की ओर से यह भी कहा गया कि यह स्वीकार किया गया तथ्य है कि मंदिर, देवता और उससे जुड़ी संपत्तियों का नियंत्रण एवं प्रबंधन दिगंबर जैन संप्रदाय के पास रहा है।
दूसरी ओर, श्वेतांबर पक्ष ने कहा कि मंदिर के धार्मिक स्वरूप में बदलाव की कोई मांग नहीं की जा रही है और विवाद केवल प्रशासन एवं प्रबंधन से संबंधित है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों पक्षों को सावधानी से आगे बढ़ने की सलाह दी। कोर्ट ने दोनों संप्रदायों से आपसी विवाद खत्म करने पर विचार करने को कहा।
इसी दौरान जस्टिस पारदीवाला ने टिप्पणी की कि जिस भगवान के लिए दोनों पक्ष लड़ने का दावा कर रहे हैं, उन्हें यह मुकदमेबाजी पसंद नहीं आएगी।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान सबसे अहम बिंदुओं में रही। अब दोनों पक्षों को आठ दिनों के भीतर लिखित दलीलें दाखिल करनी हैं, जिसके बाद अदालत अपने फैसले पर आगे बढ़ेगी।
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