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सबरीमाला पर फिर छिड़ी बड़ी बहस! केंद्र ने कहा- 2018 का फैसला गलत, सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं की एंट्री पर नई सुनवाई

देश: के सबसे चर्चित धार्मिक और संवैधानिक मामलों में से एक, Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। मंगलवार को Supreme Court of India की 9 जजों की संविधान पीठ ने इस मामले पर सुनवाई शुरू की, जो करीब पांच घंटे तक चली।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला “गलत” था। केंद्र का तर्क है कि यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अधिकार से जुड़ा है, जिसमें अदालतों को दखल नहीं देना चाहिए।

आस्था बनाम मौलिक अधिकार की बहस

केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि हर धार्मिक समूह को अपनी परंपराओं और प्रथाओं का पालन करने का अधिकार है। हर प्रथा को व्यक्तिगत स्वतंत्रता या समानता के अधिकार से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

सरकार ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी धार्मिक स्थल पर सिर ढकना अनिवार्य है, तो इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।

हालांकि, सुनवाई के दौरान जस्टिस B. V. Nagarathna ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रथा के तहत महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान “अछूत” माना जाता है, तो यह समझ से परे है कि तीन दिन तक ऐसा माना जाए और चौथे दिन नहीं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में धार्मिक प्रथा है या सामाजिक भेदभाव।

अदालत की भूमिका पर केंद्र का पक्ष

केंद्र ने जोर देकर कहा कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत, वैज्ञानिक या आधुनिक है या नहीं। यदि कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका समाधान संसद या राज्य विधानसभाओं के माध्यम से होना चाहिए, न कि न्यायपालिका के जरिए।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वे प्रथाएं ही तुरंत खारिज की जा सकती हैं, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों, जैसे मानव बलि।

50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं लंबित हैं। इन याचिकाओं पर 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक चरणबद्ध तरीके से सुनवाई की जाएगी।

पहले चरण में याचिकाकर्ता और उनके समर्थक अपनी दलीलें रखेंगे, जबकि दूसरे चरण में विरोधी पक्ष अपनी बात रखेगा।

सिर्फ सबरीमाला नहीं, कई मुद्दे जुड़े

यह सुनवाई केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं है। कोर्ट इस दौरान कई अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर भी विचार करेगा, जिनमें शामिल हैं:

  • मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का अधिकार
  • दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना
  • पारसी महिलाओं को अग्नि मंदिर में प्रवेश का अधिकार
  • धार्मिक प्रथाओं में लैंगिक भेदभाव

इन सभी मामलों में अदालत यह तय करेगी कि क्या धार्मिक परंपराएं मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं या नहीं।

2018 के फैसले की पृष्ठभूमि

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। इस फैसले के बाद 2019 में पहली बार दो महिलाओं ने पुलिस सुरक्षा में मंदिर में प्रवेश किया था।

हालांकि, इस फैसले का देशभर में विरोध भी हुआ और कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब सुनवाई हो रही है।

आगे क्या?

अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो यह तय करेगा कि 2018 का फैसला बरकरार रहेगा या उसमें बदलाव होगा। यह निर्णय न केवल सबरीमाला बल्कि देशभर में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के अधिकारों की दिशा तय कर सकता है।


निष्कर्ष:

सबरीमाला मामला एक बार फिर आस्था और संविधान के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला देश में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता की बहस को नई दिशा देगा।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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