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“वित्तीय संकट बहाना नहीं”: रोडवेज वेतन मामले में हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, दो माह में बकाया चुकाने का आदेश

राजस्थान: हाई कोर्ट ने रोडवेज कर्मचारियों के वेतन और बकाया भुगतान से जुड़े एक अहम मामले में कड़ी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि आर्थिक तंगी का हवाला देकर कर्मचारियों के वैध दावों को नकारा नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि चालक, परिचालक, सहायक कर्मचारी और मैकेनिक ही सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की रीढ़ हैं और उनके अधिकारों की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है।

जस्टिस अशोक कुमार जैन ने मोहन सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि निगम वित्तीय संकट में है तो इसका कारण कुप्रबंधन और पेशेवर नेतृत्व की कमी है। इस स्थिति का बोझ कर्मचारियों पर नहीं डाला जा सकता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि सरकार को कुप्रबंधन की चिंता है, तो पहले प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए।

क्या है मामला?

याचिकाकर्ता मोहन सिंह ने अप्रैल 2014 में अजमेर डिपो से चालक पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली थी। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें सभी लाभ समय पर नहीं मिले। मामला राष्ट्रीय लोक अदालत पहुंचा, जहां 12 दिसंबर 2015 को समझौता हुआ कि नौ माह के भीतर 6% ब्याज सहित भुगतान किया जाएगा।

हालांकि, 1998 से 2011 तक के साप्ताहिक अवकाश का भुगतान लंबित रह गया। इसी मुद्दे को लेकर याचिका दायर की गई।

रोडवेज का पक्ष

निगम की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2021 के एक सर्कुलर के अनुसार भुगतान की प्राथमिकता तय की गई है और उसी के अनुसार भुगतान किया जा रहा है। साथ ही जून 2011 के सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा गया कि चालक-परिचालकों की ड्यूटी पूर्ण क्रू उपयोग के आधार पर तय की गई थी तथा विशेष परिस्थितियों में राजपत्रित अवकाश के बदले तीन दिनों में वैकल्पिक अवकाश देने के निर्देश थे, ताकि अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े।

अदालत की सख्त टिप्पणी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि 2011 से पूर्व का साप्ताहिक अवकाश भुगतान अब भी शेष है और इस संबंध में रोडवेज की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर कर्मचारियों के वैध अधिकारों को रोका नहीं जा सकता।

अदालत ने आदेश दिया कि लंबित बकाया राशि का भुगतान दो माह के भीतर किया जाए।

व्यापक प्रभाव

इस आदेश को रोडवेज कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से वेतन और भत्तों को लेकर विवादों के बीच हाई कोर्ट की यह टिप्पणी निगम प्रशासन पर जवाबदेही बढ़ाने का संकेत देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में अन्य समान मामलों के लिए भी मार्गदर्शक बन सकता है।


निष्कर्ष:

राजस्थान हाई कोर्ट का यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि सार्वजनिक उपक्रमों में वित्तीय अव्यवस्था का खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए। यदि कुप्रबंधन है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए—न कि कर्मचारियों के वैध वेतन और भत्तों पर रोक लगाई जाए। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आरएसआरटीसी निर्धारित समयसीमा में भुगतान सुनिश्चित करता है या नहीं।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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