पश्चिम एशिया: एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति के सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। Iran, Israel और United States के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह दशकों से चल रहे प्रॉक्सी युद्ध का खुला और प्रत्यक्ष रूप बन चुका है। हाल के दिनों में ईरान के कई सैन्य ठिकानों, तेल भंडारण केंद्रों और ऊर्जा अवसंरचना पर हुए हमलों ने इस संघर्ष को और अधिक गंभीर बना दिया है।
राजधानी Tehran के आसमान में दिखाई देता काला धुआं और लगातार सक्रिय एयर डिफेंस सिस्टम इस बात का संकेत हैं कि युद्ध का दबाव अब ईरान के भीतर तक महसूस किया जा रहा है। इस स्थिति ने वैश्विक रणनीतिक समुदाय को भी चिंतित कर दिया है।
इस टकराव की जड़ें केवल वर्तमान घटनाओं में नहीं बल्कि इतिहास में छिपी हैं। Iranian Revolution 1979 के बाद ईरान ने स्वयं को केवल एक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं बल्कि एक वैचारिक आंदोलन के केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया।
इस क्रांति के बाद तेहरान की सत्ता ने पश्चिम एशिया में ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की कल्पना की जिसमें इज़राइल का अस्तित्व स्वीकार्य न हो। यही कारण है कि ईरान की रणनीति में प्रत्यक्ष युद्ध की बजाय प्रॉक्सी संगठनों के माध्यम से प्रभाव बढ़ाने पर अधिक जोर दिया गया।
ईरान की रणनीतिक नीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क माना जाता है। Hezbollah (लेबनान) और Hamas (गाज़ा) जैसे संगठनों को अक्सर उसी रणनीतिक ढांचे का हिस्सा बताया जाता है।
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इन संगठनों को राजनीतिक, वैचारिक और सैन्य समर्थन ईरान से मिलता रहा है। इन समूहों की विचारधारा में इज़राइल के अस्तित्व को समाप्त करना एक प्रमुख लक्ष्य बताया जाता है।
इसी कारण इज़राइल के लिए यह संघर्ष केवल सुरक्षा का सवाल नहीं बल्कि उसके अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
दूसरी ओर, इज़राइल की सैन्य क्षमता को अमेरिका के समर्थन से और मजबूती मिलती है। आधुनिक अमेरिका केवल पारंपरिक सैन्य शक्ति पर निर्भर नहीं है बल्कि साइबर युद्ध, अंतरिक्ष तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रक्षा प्रणाली और सटीक निर्देशित हथियारों में भी अग्रणी है।
जब अमेरिका और इज़राइल की सैन्य और खुफिया क्षमताएं एक साथ काम करती हैं, तो उनका संयुक्त प्रभाव किसी भी क्षेत्रीय शक्ति के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
विश्लेषकों के अनुसार पिछले कुछ दिनों में हुए हमलों ने ईरान के सैन्य ठिकानों और ऊर्जा नेटवर्क को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। तेल डिपो और ऊर्जा अवसंरचना पर हमले विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं क्योंकि ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक ऊर्जा निर्यात पर निर्भर करती है।
दिलचस्प बात यह है कि ईरान की राजनीतिक और धार्मिक भाषा में इस संघर्ष को कई बार ऐतिहासिक Battle of Karbala से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है।
कर्बला की कथा में हार के बावजूद नैतिक और वैचारिक विजय का प्रतीकात्मक महत्व बताया जाता है। इसी कारण ईरान के भीतर कई बार यह संदेश दिया जाता है कि यदि सैन्य नुकसान भी हो जाए तो भी संघर्ष जारी रखना एक धार्मिक और वैचारिक कर्तव्य है।
अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समुदाय के भीतर इस युद्ध के परिणामों को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अपनी मिसाइल क्षमता, क्षेत्रीय नेटवर्क और भौगोलिक स्थिति के कारण लंबे समय तक प्रतिरोध कर सकता है।
वहीं कई विश्लेषकों का कहना है कि तकनीकी और खुफिया श्रेष्ठता के कारण अमेरिका और इज़राइल इस संघर्ष में निर्णायक बढ़त बनाए रख सकते हैं।
भारत के लिए पश्चिम एशिया का यह संघर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से भारत का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर करता है।
इसके अलावा Strait of Hormuz जैसे समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। यहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
भारत की विदेश नीति इसलिए इस मामले में संतुलित और व्यावहारिक दिखाई देती है। एक ओर वह ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, वहीं दूसरी ओर आतंकवाद और प्रॉक्सी नेटवर्क के खिलाफ सख्त रुख भी बनाए रखता है।
पश्चिम एशिया में चल रहा यह संघर्ष केवल तीन देशों के बीच की लड़ाई नहीं बल्कि विचारधारा, शक्ति संतुलन और भू-राजनीतिक प्रभाव की जटिल प्रतिस्पर्धा का परिणाम है। वर्तमान परिस्थितियों में तकनीकी और सैन्य दृष्टि से अमेरिका और इज़राइल की बढ़त स्पष्ट दिखाई देती है, जबकि ईरान अपनी क्षेत्रीय रणनीति और वैचारिक प्रेरणा के सहारे इस संघर्ष को लंबा खींचने की कोशिश कर सकता है। आने वाले समय में यह युद्ध न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी वैश्विक राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
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