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इच्छामृत्यु के बाद विदाई: 13 साल कोमा में रहे हरीश राणा का अंतिम संस्कार, अंगदान से 6 को मिली नई जिंदगी

दिल्ली: और गाजियाबाद के बीच एक ऐसा भावुक और ऐतिहासिक मामला सामने आया, जिसने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया। 13 साल तक कोमा में रहने के बाद इच्छामृत्यु पाने वाले हरीश राणा का बुधवार सुबह दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान हर किसी की आंखें नम थीं, लेकिन पिता अशोक राणा के शब्दों ने माहौल को और भी भावुक बना दिया।

अंतिम संस्कार के समय पिता ने हाथ जोड़कर सभी से अपील की— “कोई रोना मत, बेटा शांति से जाए।” यह शब्द न सिर्फ एक पिता के दर्द को दर्शाते हैं, बल्कि उस साहस को भी दिखाते हैं जो इस परिवार ने पिछले 13 वर्षों में जिया।

13 साल का संघर्ष और एक कठिन फैसला

31 वर्षीय हरीश राणा ने 24 मार्च 2026 को दिल्ली के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे। साल 2013 में चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी के हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

इस दुर्घटना के बाद उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा, जिसमें पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो जाता है। हरीश न बोल सकते थे, न किसी चीज को महसूस कर सकते थे। उनका जीवन पूरी तरह से वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब पर निर्भर था।

समय के साथ उनकी हालत और बिगड़ती गई। शरीर पर गहरे घाव (बेडसोर्स) बन गए और परिवार पर आर्थिक और मानसिक दबाव लगातार बढ़ता गया।

सुप्रीम कोर्ट से मिली अनुमति

परिवार ने सबसे पहले 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हरीश को पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी।

पैसिव यूथेनेशिया का मतलब है कि मरीज को जिंदा रखने के लिए दिए जा रहे कृत्रिम लाइफ सपोर्ट को हटा दिया जाए, ताकि उसकी प्राकृतिक मृत्यु हो सके।

अंगदान बना उम्मीद की किरण

हरीश राणा के परिवार ने इस दुखद क्षण को भी मानवता के लिए एक मिसाल बना दिया। उन्होंने हरीश के फेफड़े, दोनों किडनी और कॉर्निया दान करने का फैसला लिया।

डॉक्टर्स के मुताबिक, इस अंगदान से 6 लोगों को नई जिंदगी मिलने की उम्मीद है। यह फैसला न सिर्फ साहसिक था, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा भी है कि कैसे एक व्यक्ति की विदाई कई जिंदगियों को रोशन कर सकती है।

अंतिम विदाई का भावुक दृश्य

ग्रीन पार्क श्मशान घाट में सुबह 9:40 बजे हरीश के छोटे भाई आशीष राणा ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान मां निर्मला राणा नंगे पैर खड़ी रहीं और लगातार रोती रहीं।

परिवार और रिश्तेदारों ने नम आंखों से हरीश को अंतिम विदाई दी। यह दृश्य हर उस व्यक्ति के दिल को छू गया, जो वहां मौजूद था।

मानवता, कानून और भावनाओं का संगम

यह मामला सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत में इच्छामृत्यु और मानवाधिकारों पर एक बड़ा उदाहरण बन गया है।

जहां एक ओर यह कानून की संवेदनशीलता को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह दिखाता है कि इंसानियत और साहस कैसे सबसे कठिन परिस्थितियों में भी रास्ता निकाल लेते हैं।

हरीश राणा का जीवन भले ही संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उनकी विदाई ने समाज को एक नई सोच दी— दर्द के अंत के साथ भी जीवन को अर्थ दिया जा सकता है।

हरीश राणा की कहानी दर्द, साहस और मानवता का संगम है। इच्छामृत्यु का यह मामला न सिर्फ कानूनी रूप से ऐतिहासिक है, बल्कि अंगदान के जरिए यह जीवन देने की सबसे बड़ी मिसाल भी बन गया। यह घटना समाज को यह सिखाती है कि कठिन फैसले भी कई बार बड़े बदलाव की राह खोलते हैं।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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