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छात्रों की अनोखी पहल! चामू के शारदा स्कूल में बनी मानव श्रृंखला, ‘ओरण बचाओ’ का गूंजा संदेश

राजस्थान: के ग्रामीण अंचल में पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। चामू क्षेत्र के नाथड़ाऊ स्थित शारदा उच्च माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों ने ‘ओरण बचाओ अभियान’ से प्रेरित होकर एक लंबी मानव श्रृंखला बनाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

इस पहल ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि आसपास के गांवों में भी जागरूकता की नई लहर पैदा कर दी है। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर वरिष्ठ कक्षाओं के छात्रों तक सभी ने हाथों में हाथ डालकर यह संदेश दिया कि ओरण और गोचर भूमि केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, संस्कृति और पारिस्थितिकी की धड़कन है।

‘ओरण बचाओ अभियान’ से मिली प्रेरणा

विद्यार्थियों की यह पहल जैसलमेर में चल रहे ‘ओरण बचाओ अभियान’ से प्रेरित है। जैसलमेर में चल रहा यह आंदोलन ओरण और गोचर भूमि को संरक्षित करने के लिए एक जनआंदोलन का रूप ले चुका है।

अभियान का उद्देश्य पारंपरिक ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराना और इसे निजी कंपनियों द्वारा अधिग्रहण से बचाना है। स्थानीय साधु-संत, किसान, पशुपालक और पर्यावरण प्रेमी लंबे समय से इस मुद्दे पर संघर्ष कर रहे हैं।

क्या है ओरण?

ओरण पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों—विशेषकर जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर—में पाई जाने वाली एक पारंपरिक व्यवस्था है। यह भूमि धार्मिक आस्था से जुड़ी होती है और सदियों से इसे सामुदायिक चारागाह एवं जल-संरक्षण क्षेत्र के रूप में उपयोग किया जाता रहा है।

ओरण केवल पशुओं के चरने का स्थान नहीं, बल्कि यह मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र का एक मजबूत स्तंभ है। यहां विभिन्न प्रकार के वन्यजीव, पक्षी और वनस्पतियां संरक्षित रहती हैं। ग्रामीण समाज में ओरण को देवभूमि का दर्जा भी प्राप्त है।

मानव श्रृंखला बनाकर दिया संदेश

शारदा उच्च माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों ने विद्यालय परिसर से लेकर मुख्य मार्ग तक मानव श्रृंखला बनाई। इस दौरान उन्होंने “ओरण बचाओ, पर्यावरण बचाओ”, “गोचर भूमि हमारी धरोहर” जैसे नारे लगाए।

विद्यालय प्रबंधन ने बताया कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना और उन्हें सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास कराना है।

कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों ने विद्यार्थियों को ओरण की ऐतिहासिक और पर्यावरणीय महत्ता के बारे में जानकारी दी। बच्चों ने शपथ ली कि वे प्रकृति संरक्षण के लिए सदैव प्रयासरत रहेंगे।

ग्रामीण संस्कृति और आस्था से जुड़ी भूमि

ओरण केवल पारिस्थितिकी का विषय नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण संस्कृति और धार्मिक आस्था का भी केंद्र है। कई गांवों में ओरण भूमि पर स्थानीय देवताओं के मंदिर स्थित होते हैं। ग्रामीण लोग इन स्थानों को पवित्र मानते हैं और यहां वृक्षों को काटना या भूमि को नुकसान पहुंचाना वर्जित समझते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पारंपरिक व्यवस्था सदियों से पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी मॉडल रही है। आधुनिक विकास की दौड़ में जब प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है, तब ओरण जैसी व्यवस्थाएं संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

कंपनियों द्वारा अधिग्रहण की चिंता

‘ओरण बचाओ अभियान’ के तहत यह मुद्दा उठाया गया है कि कई स्थानों पर ओरण और गोचर भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया है। इससे भविष्य में इन जमीनों के औद्योगिक या निजी उपयोग में जाने का खतरा बना रहता है।

अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि ओरण भूमि समाप्त होती है तो मरुस्थलीय क्षेत्रों में जल संकट और पशुधन संकट गहरा सकता है।

छात्रों की भागीदारी क्यों अहम?

विशेषज्ञों के अनुसार पर्यावरण संरक्षण के लिए युवाओं और विद्यार्थियों की भागीदारी बेहद जरूरी है। जब बच्चे इस तरह के अभियानों में शामिल होते हैं, तो वे भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बनते हैं।

शारदा स्कूल के इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि जागरूकता की शुरुआत विद्यालय स्तर से की जाए तो उसका प्रभाव समाज तक पहुंचता है।

विद्यालय के प्रधानाचार्य ने कहा कि यह कार्यक्रम केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि बच्चों के भीतर प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का प्रयास है।

स्थानीय समुदाय की सराहना

कार्यक्रम के दौरान कई अभिभावक और ग्रामीण भी उपस्थित रहे। उन्होंने छात्रों की इस पहल की सराहना की और कहा कि इस तरह के प्रयासों से समाज में सकारात्मक संदेश जाता है।

कुछ ग्रामीणों ने सुझाव दिया कि भविष्य में वृक्षारोपण अभियान और जल संरक्षण कार्यशालाएं भी आयोजित की जानी चाहिए।

पर्यावरण संरक्षण की व्यापक जरूरत

राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में जल संकट और भूमि क्षरण की समस्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में ओरण और गोचर भूमि का संरक्षण केवल परंपरा का विषय नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय किया जाए तो पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

शिक्षा और जागरूकता का संगम

यह पहल शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का एक सुंदर उदाहरण है। जब विद्यार्थी अपने पाठ्यक्रम से बाहर निकलकर सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो वे समाज के लिए प्रेरणा बनते हैं।

शारदा उच्च माध्यमिक विद्यालय की यह मानव श्रृंखला केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक संदेश है—प्रकृति की रक्षा के बिना विकास संभव नहीं।


निष्कर्ष:

चामू के शारदा स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई मानव श्रृंखला ने यह सिद्ध कर दिया कि पर्यावरण संरक्षण की भावना उम्र की मोहताज नहीं होती। ‘ओरण बचाओ अभियान’ से प्रेरित यह पहल आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

यदि इसी तरह स्कूल, समाज और प्रशासन मिलकर प्रयास करें, तो ओरण और गोचर भूमि जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं को संरक्षित रखा जा सकता है। यह पहल केवल चामू तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बननी चाहिए।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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