राजस्थान: की राजधानी जयपुर में इन दिनों कला का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। यहां आयोजित कला मेले में कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का ऐसा प्रदर्शन किया कि कलाप्रेमी भी दंग रह गए। खास बात यह रही कि एक कलाकार ने पारंपरिक कूंची (ब्रश) की जगह कपड़े का इस्तेमाल कर लाइव पेंटिंग बनाई, जिसने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
यह अनूठा आयोजन राजस्थान ललित कला अकादमी द्वारा जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम में आयोजित किया गया। बुधवार से शुरू हुए इस कला मेले में वरिष्ठ कलाकारों का आर्ट कैम्प लगाया गया है, जिसमें प्रदेश के नामचीन कलाकार अपनी-अपनी विशिष्ट शैली में कलाकृतियों का सृजन कर रहे हैं।
इस आर्ट कैम्प में विशेष आकर्षण रहे वरिष्ठ कलाकार आर. बी. गौतम, जिन्होंने कपड़े के जरिए कैनवास पर पेंटिंग बनाई। आमतौर पर पेंटिंग के लिए ब्रश का उपयोग किया जाता है, लेकिन कपड़े से रंगों को उकेरना दर्शकों के लिए एक नया और रोमांचक अनुभव था। लाइव पेंटिंग के दौरान बड़ी संख्या में मौजूद दर्शक इस तकनीक को देखकर हैरान रह गए।
कैंप में सिर्फ यही नहीं, बल्कि कई अन्य कलाकार भी अपनी अलग-अलग शैलियों में कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें बसंत कश्यप, भवानी शंकर शर्मा, घनश्याम निम्बार्क, कैलाश चंद शर्मा, समदर सिंह खंगारोत और वी. एस. उपाध्याय जैसे वरिष्ठ नाम शामिल हैं।
इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यहां वरिष्ठ कलाकार युवा कलाकारों के साथ संवाद कर रहे हैं। वे उन्हें कला की बारीकियां सिखा रहे हैं और लाइव डेमो के माध्यम से नई तकनीकों से परिचित करा रहे हैं। इससे युवा कलाकारों को सीखने और प्रेरणा लेने का बेहतरीन अवसर मिल रहा है।
वरिष्ठ चित्रकार विद्यासागर उपाध्याय ने कहा कि इस तरह के कला शिविर युवा प्रतिभाओं को निखारने के लिए बेहद जरूरी हैं। वहीं पूर्व चेयरमैन भवानी शंकर शर्मा ने इसे देशभर में चर्चित आयोजन बताते हुए कहा कि यह कलाकारों को सृजन के लिए प्रेरित करता है।
इस कला मेले में एक और खास आकर्षण फ्रेस्को आर्ट कैम्प है। इसमें वरिष्ठ चित्रकार नाथू लाल वर्मा के निर्देशन में 25 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। इस कैम्प का उद्देश्य लुप्त होती फ्रेस्को कला को फिर से जीवंत करना है।
फ्रेस्को एक प्राचीन भित्ति चित्रकला तकनीक है, जिसमें गीले प्लास्टर पर सीधे रंग लगाए जाते हैं। इस प्रक्रिया में रंग दीवार के साथ स्थायी रूप से जुड़ जाते हैं, जिससे पेंटिंग लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। इसे ‘आला-गीला’ पद्धति भी कहा जाता है। आज के आधुनिक समय में यह कला धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है, लेकिन इस तरह के आयोजनों के जरिए इसे फिर से लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जा रही है।
कला मेला संयोजक हरशिव शर्मा ने बताया कि इस बार ऐसे कलाकारों को शामिल किया गया है, जिन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। उनके अनुभव से युवा कलाकारों को सीखने का मौका मिल रहा है।
इसके अलावा कैलीग्राफी कैम्प भी आयोजित किया जा रहा है, जिसका संचालन हरिशंकर बालोठिया कर रहे हैं। मेले में करीब 100 स्टॉल लगाए गए हैं, जिनमें प्रदेशभर के लगभग 400 कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं।
कुल मिलाकर यह कला मेला न सिर्फ कलाकारों के लिए, बल्कि कला प्रेमियों के लिए भी एक अद्भुत अनुभव बन गया है। यहां पारंपरिक और आधुनिक कला का सुंदर संगम देखने को मिल रहा है।
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