मध्य पूर्व: में जारी संघर्ष ने अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। 19 मार्च 2026 को कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया, जहां भारतीय बास्केट की कीमत बढ़कर 146 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। यह उछाल आने वाले दिनों में आम जनता के लिए महंगाई का संकेत दे रहा है।
इस तेजी के पीछे मुख्य वजह खाड़ी देशों में बढ़ते हमले हैं। ईरान द्वारा सऊदी अरब, कतर और अन्य देशों के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाए जाने से सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ा है। खासतौर पर कतर के रास लफ्फान गैस प्लांट को नुकसान पहुंचने के बाद उसे बंद करना पड़ा, जिससे वैश्विक गैस सप्लाई प्रभावित हुई।
युद्ध से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे थी, लेकिन अब यह बढ़कर 114 डॉलर तक पहुंच चुकी है। भारत के लिए महत्वपूर्ण इंडियन बास्केट 146 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है।
कच्चे तेल की कीमतें मुख्य रूप से तीन बेंचमार्क—ब्रेंट, WTI और OPEC बास्केट—पर आधारित होती हैं। भारत अलग-अलग देशों से तेल खरीदता है, इसलिए उसकी औसत कीमत इंडियन बास्केट से तय होती है।
तेल के साथ-साथ प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी भारी वृद्धि हुई है। यूरोप में गैस की कीमतें 30% तक बढ़ी हैं, जबकि ब्रिटेन में यह बढ़ोतरी 140% तक पहुंच गई है। इसका प्रमुख कारण कतर गैस प्लांट का बंद होना और सप्लाई में रुकावट है।
होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के लगभग 20% पेट्रोलियम सप्लाई का मार्ग है, अब असुरक्षित हो गया है। युद्ध के कारण यहां से जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है।
भारत के लिए यह स्थिति गंभीर है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल और 50% से अधिक गैस आयात करता है। इनका बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 10 से 15 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।
हाल ही में LPG सिलेंडर की कीमतों में 60 रुपए की बढ़ोतरी हो चुकी है, और अब इसमें और इजाफा संभव है।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। डीजल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे खाद्य पदार्थों, सब्जियों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं।
इसके अलावा प्लास्टिक, दवाइयां और उर्वरकों जैसे उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं, जिससे आम आदमी का बजट प्रभावित होगा।
ऊर्जा संकट का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। यूरोप में पहले से ही ऊर्जा संकट गहराया हुआ था, और अब यह स्थिति और गंभीर हो गई है। उद्योगों और घरेलू उपभोक्ताओं दोनों को इसका सामना करना पड़ रहा है।
All Rights Reserved & Copyright © 2015 By HP NEWS. Powered by Ui Systems Pvt. Ltd.