Download App Now Register Now

गरीबी सजा से बड़ी नहीं: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जुर्माना न भर पाने पर कैदी की रिहाई नहीं रोकी जा सकती

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम और मानवीय फैसला सुनाते हुए गरीबी के कारण जुर्माना अदा न कर पाने वाले कैदियों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ आर्थिक असमर्थता के चलते किसी व्यक्ति को जेल में बंद रखना, उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

यह फैसला जस्टिस अनूप ढंड ने एनडीपीएस एक्ट के मामले में अजमेर जेल में बंद कैदी राजेश कुशवाह की अपील पर सुनाया।


सजा निलंबित होने के बावजूद जेल में रहा कैदी

राजेश कुशवाह को एनडीपीएस मामले में 10 साल की सजा हुई थी, जिसमें से वह 7 साल 11 महीने की सजा पूरी कर चुका है। हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर 2025 को उसकी सजा निलंबित करते हुए कुछ शर्तों के साथ रिहा करने का आदेश दिया था।

इन शर्तों में एक शर्त यह भी थी कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया एक लाख रुपये का जुर्माना जमा करेगा। हालांकि, गरीबी के कारण राजेश कुशवाह यह राशि जमा नहीं कर पाया और रिहाई के आदेश के बावजूद तीन महीने से अधिक समय तक जेल में ही बंद रहा।


जुर्माना शर्त हटाई, रिहाई के आदेश

मामले की दोबारा सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने एक लाख रुपये जुर्माना जमा कराने की शर्त को पूरी तरह हटा दिया और अन्य शर्तों की पूर्ति पर उसकी तत्काल रिहाई के आदेश दिए।


कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा—

“सजा निलंबन के समय कोर्ट द्वारा लगाई जाने वाली शर्तें न्यायसंगत होनी चाहिए। यदि कोई अभियुक्त आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है, तो जुर्माना जमा करने की शर्त उसकी अपील के अधिकार को निष्प्रभावी बना देती है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गरीबी किसी को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित करने का आधार नहीं बन सकती।


गरीब कैदियों के लिए मिसाल बनेगा फैसला

यह फैसला उन हजारों कैदियों के लिए राहत लेकर आया है, जो अदालत से रिहाई के आदेश मिलने के बावजूद केवल जुर्माना न भर पाने के कारण जेल में बंद रह जाते हैं। हाईकोर्ट का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में समानता और मानवाधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


निष्कर्ष:

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य दंड नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है। आर्थिक कमजोरी को स्वतंत्रता में बाधा नहीं बनाया जा सकता। यह निर्णय गरीब और वंचित कैदियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा में एक ऐतिहासिक मिसाल साबित होगा।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

Related News

All Rights Reserved & Copyright © 2015 By HP NEWS. Powered by Ui Systems Pvt. Ltd.

BREAKING NEWS
अर्नब चक्रवात का असर: राजस्थान में बारिश के साथ गिरे ओले, उत्तराखंड में बर्फबारी; ओडिशा में बाढ़-भूस्खलन से 3 की मौत | खाटूश्याम बाबा के दर्शन साढ़े 19 घंटे रहेंगे बंद, दीपावली पर मंदिर में होगी साफ-सफाई; जानें नया शेड्यूल | राजस्थान पंचायत चुनाव परिणाम: नीमकाथाना की 39 ग्राम पंचायतों में सरपंचों के नतीजे घोषित, सिरोही में सबसे बड़ी जीत | सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर अमित शाह ने दी श्रद्धांजलि, बोले- 2029 तक देश को नशामुक्त बनाने का लक्ष्य | सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर जयपुर में ‘रन फॉर यूनिटी’, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने दिलाई एकता की शपथ | चक्रवात अर्नब की ताजा अपडेट: कमजोर पड़ा चक्रवात अर्नब, राजस्थान से बिहार तक मौसम का अलर्ट; अंडमान सागर में नया सिस्टम सक्रिय | चुनाव आयोग का बड़ा फैसला: दिल्ली, महाराष्ट्र समेत 6 राज्यों में SIR की समयसीमा बढ़ाई, जानिए नई तारीखें | RSS के गढ़ नागपुर में कांग्रेस की जीत से BJP को झटका, पुणे में भी हारी; जानिए कहां बिगड़ा चुनावी गणित | भूटान में ग्लेशियर झील फटी, गासा का मशहूर गर्म पानी का कुंड बहा; भारत में बाढ़ का खतरा, बंगाल में 10 हजार लोग सुरक्षित स्थानों पर भेजे गए | मोदी नहीं, 'ओदी' कहिए... ज्ञानेश कुमार का नाम भी बदला, CJP नेता आशुतोष रांका ने समर्थकों को सिखाई कोड लैंग्वेज |