सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने यह फैसला सुनाया। झबरा राम को राजस्थान हाईकोर्ट से जमानत मिली थी, जिसे चुनौती देते हुए जांच एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
जमानत रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने कथित प्रक्रियागत अनियमितता को जमानत देने का पर्याप्त आधार माना, जबकि मामले में आरोपों की गंभीरता और जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों पर उचित ध्यान दिया जाना जरूरी था।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं है। अदालत की टिप्पणियां जमानत रद्द करने तक सीमित रहेंगी और इनका मुकदमे की सुनवाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, झबरा राम को राजस्थान CID इंटेलिजेंस ने 30 जनवरी को जैसलमेर जिले के पोकरण क्षेत्र से गिरफ्तार किया था। उस पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करने और सेना से संबंधित गोपनीय जानकारियां सीमा पार अपने कथित हैंडलर्स तक पहुंचाने के आरोप हैं।
मामले में आरोपी के खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कार्रवाई की गई है। आरोपों के मुताबिक, वह सेना से जुड़ी संवेदनशील गतिविधियों की जानकारी जुटाकर साझा करता था। इन आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के तहत होनी है।
राजस्थान हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद जांच एजेंसी ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। शीर्ष अदालत ने जमानत रद्द करते हुए आरोपी को दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है। अब मामले में आगे की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेश और संबंधित अदालत की प्रक्रिया के अनुसार होगी।
महत्वपूर्ण: आरोपी पर लगे जासूसी संबंधी आरोप न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। अंतिम दोषसिद्धि होने तक आरोपों को साबित हुआ अपराध नहीं माना जा सकता।
नोट: प्रकाशन से पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तारीख, पीठ के विवरण और सरेंडर संबंधी निर्देशों की आधिकारिक आदेश प्रति से पुष्टि कर लें।
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