जयपुर/अलवर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग के कथित अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म के मामले में चार आरोपियों की सजा रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया है। अदालत ने जांच में गंभीर खामियों को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। हाईकोर्ट के अनुसार, अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
न्यायमूर्ति महेंद्र कुमार गोयल और न्यायमूर्ति भुवन गोयल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले अलवर की पॉक्सो अदालत ने 2 जून 2023 को चारों आरोपियों को प्राकृतिक जीवन के अंत तक कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी अंजलि अजीत जोतवाल और पुलिस टीम की जांच प्रक्रिया पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत के अनुसार, साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और कानूनी प्रक्रिया का पालन करने में लापरवाही हुई, जिससे अभियोजन के मामले में महत्वपूर्ण कमियां रह गईं।
अदालत ने पाया कि अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और पीड़िता की उम्र से जुड़े आरोपों को पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित नहीं किया जा सका। इसी आधार पर आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने पीड़िता के शुरुआती लिखित बयान और अदालत में दिए गए बयानों के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना। शिकायत में बाड़े और नदी के पास सुनसान जगह पर दुष्कर्म किए जाने का उल्लेख था, जबकि अदालत में दिए गए बयान में घटना के स्थान और घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग बातें सामने आईं।
अभियोजन के अनुसार, चारों आरोपियों ने वारदात को अंजाम दिया था। हालांकि, पीड़िता के बयानों में घटना के क्रम और आरोपियों की भूमिका को लेकर विरोधाभास पाए गए। अदालत ने इन विसंगतियों को अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता के आकलन में महत्वपूर्ण माना।
अदालत के सामने पेश मेडिकल साक्ष्यों में चोटों और अन्य निष्कर्षों को लेकर विचार किया गया। फैसले के अनुसार, डॉक्टरों ने शरीर पर ताजा चोट के निशान नहीं पाए थे। निजी अंग पर मामूली खरोंच का उल्लेख था, जिसके संभावित कारण को लेकर भी स्पष्टीकरण दिया गया था।
डीएनए रिपोर्ट को लेकर भी हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की सुरक्षित रख-रखाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए। अदालत के अनुसार, नमूनों को सुरक्षित रखने की पूरी प्रक्रिया साबित नहीं की गई। एफएसएल भेजने में देरी, मालखाना रजिस्टर में रिकॉर्ड की कमी और नमूनों के पैकेट की नंबरिंग में विसंगतियां सामने आईं। डीएनए रिपोर्ट तैयार करने वाले वैज्ञानिक विशेषज्ञों को भी गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने एफआईआर के समय और उससे जुड़े रिकॉर्ड की स्थिति पर भी ध्यान दिया। पीड़िता के अनुसार, घटना के बाद वह रात में पुलिस चौकी पहुंची थी, लेकिन अभियोजन पक्ष पहली शिकायत या उस समय की रोजनामचा प्रविष्टि अदालत में पेश नहीं कर सका।
एफआईआर अगले दिन सुबह दर्ज दिखाई गई, जबकि मजिस्ट्रेट अदालत तक पहुंचने में लगभग तीन महीने की देरी हुई। अदालत के सामने इस देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। हाईकोर्ट ने इसे मामले की जांच में एक महत्वपूर्ण कमी माना।
अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए दसवीं कक्षा की मार्कशीट का सहारा लिया था। हाईकोर्ट ने पाया कि मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि स्कूल में प्रवेश के समय भरे गए फॉर्म से ली गई थी, लेकिन उस तारीख का मूल आधार साबित नहीं किया गया।
अदालत के अनुसार, स्कूल प्रवेश फॉर्म भरने वाले पिता या संबंधित हेडमास्टर को गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया। इस कारण घटना के समय पीड़िता के नाबालिग होने का दावा भी पर्याप्त रूप से साबित नहीं हो सका।
मामले के अनुसार, 27 सितंबर 2019 की रात अलवर जिले में चार आरोपियों पर पीड़िता को कार में ले जाकर सामूहिक दुष्कर्म करने का आरोप लगाया गया था। शिकायत में घटना का वीडियो साझा करने और परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी देने का भी आरोप था।
लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखा था। 26 अक्टूबर को फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाया गया और इसके बाद विस्तृत निर्णय जारी किया गया।
हाईकोर्ट के फैसले का मुख्य आधार यह रहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अदालत ने जांच, मेडिकल और डीएनए साक्ष्यों तथा पीड़िता की उम्र से जुड़े प्रमाणों में सामने आई कमियों को ध्यान में रखते हुए चारों आरोपियों की सजा रद्द कर उन्हें बरी कर दिया।
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