दीपकों की बढ़ती मांग को देखते हुए वर्तमान में प्रतिदिन करीब 10 हजार दीपकों का निर्माण किया जा रहा है। इस वर्ष राजस्थान सहित देश के 17 राज्यों में करीब 7 लाख दीपक भेजे गए हैं, जबकि मॉरीशस में 10 लाख दीपकों की बड़ी खेप पहुंचाई गई है।
अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता ने बताया कि इस अभियान की सबसे खास बात यह है कि दीपकों के निर्माण से लेकर उनकी पैकेजिंग तक की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं को सौंपी गई है। इससे स्थानीय महिलाओं को रोजगार मिलने के साथ पारंपरिक संसाधनों पर आधारित स्वदेशी उत्पादों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है।
अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद की अंतरराष्ट्रीय सह-संयोजक एवं हैनीमैन चैरिटेबल मिशन सोसाइटी की सचिव मोनिका गुप्ता ने बताया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
उन्होंने बताया कि गोबर आधारित कुटीर उद्योगों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा रहे हैं। इसी क्रम में टोंक, निवाई, बस्सी, मालपुरा, भरतपुर और जयपुर के 10 महिला सहायता समूहों की 100 से अधिक महिलाएं पिछले करीब छह महीनों से दीपक और गोबर से बने अन्य उत्पाद तैयार कर रही हैं।
मोनिका गुप्ता के अनुसार, हमारा उद्देश्य महिलाओं को केवल कामगार तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उन्हें भविष्य की सफल उद्यमी बनाना है, ताकि वे स्वयं का व्यवसाय स्थापित कर आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें।
आम परिवारों के बजट को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष पांच अलग-अलग तरह के आकर्षक गोबर के दीपक तैयार किए गए हैं। इनकी कीमत 5, 10, 15, 25 और 30 रुपये प्रति दीपक रखी गई है।
इन दीपकों को विशेष निर्माण प्रक्रिया से तैयार किया जाता है, जिससे तेल रिसाव की समस्या नहीं होती। साथ ही दीपक जलने के दौरान पात्र के जल्दी जलने जैसी परेशानियों को भी कम करने का प्रयास किया गया है। पारंपरिक दीपावली सजावट के साथ पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के रूप में इन दीपकों को पसंद किया जा रहा है।
इस पहल के तहत गाय के गोबर को केवल कृषि उपयोग तक सीमित न रखकर उससे कई तरह के उपयोगी और सजावटी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनमें जैविक खाद, धूपबत्ती, गमले, गौमाता की प्रतिमाएं, गणेश जी, आदियोगी, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, शुभ-लाभ, ओम, श्री, ब्रेसलेट और मालाएं सहित कई उत्पाद शामिल हैं।
प्राकृतिक सामग्री से बने इन उत्पादों को बढ़ावा देने का उद्देश्य प्लास्टिक आधारित सजावटी वस्तुओं पर निर्भरता कम करना और गोबर के बेहतर उपयोग को प्रोत्साहित करना है।
उपयोग के बाद गोबर के दीपकों के अवशेषों का उचित प्रबंधन भी इस पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कंपोस्टिंग के अनुकूल सामग्री से बने दीपकों में से बाती, तेल और अन्य अनुपयुक्त सामग्री अलग करने के बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत अवशेषों का जैविक खाद बनाने में उपयोग किया जा सकता है।
डॉ. अतुल गुप्ता ने बताया कि अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद से करीब 4 हजार गौशालाएं जुड़ी हुई हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से गोबर आधारित उत्पादों के निर्माण, प्रशिक्षण और विपणन की संभावनाओं को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकता है।
उनका कहना है कि गौशालाओं को केवल गौवंश के आश्रय स्थल के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण उद्योग, महिला रोजगार और कौशल विकास के केंद्र के रूप में भी विकसित किया जाना चाहिए।
जयपुर की यह पहल गौसेवा, पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण को एक साथ जोड़ते हुए स्वदेशी कुटीर उद्योगों के लिए नई संभावनाएं खोल रही है। गोबर से तैयार दीपकों की देश-विदेश में बढ़ती मांग इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय संसाधनों और महिलाओं के हुनर को सही मंच मिले तो रोजगार और उद्यमिता के नए रास्ते तैयार हो सकते हैं।
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